कड़वे स्वभाव का विसर्जन और आत्म-शुद्धि से ही सिद्ध होता है तीजा का पावन संकल्प: बीके स्वाति दीदी

13 सितंबर 2026, बिलासपुर: प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की बिलासपुर मुख्य शाखा, टेलीफोन एक्सचेंज रोड स्थित राजयोग भवन की संचालिका ब्रह्माकुमारी स्वाति दीदी ने तीजा के पावन अवसर पर सर्व समाज को हार्दिक शुभकामनाएं दी हैं।
इस शुभ अवसर पर बीके स्वाति दीदी ने तीजा पर्व के गूढ़ आध्यात्मिक रहस्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि लोक परंपराओं में तीजा का व्रत पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए रखा जाता है, लेकिन इसका वास्तविक आध्यात्मिक रहस्य पार वतन मे रहने वाली आत्मा रूपी पार्वती का परमात्मा शिव को पाने के लिए की जाने वाली सच्ची तपस्या से है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तप किया था। अध्यात्म में इसका अर्थ है कि जब जीवात्मा काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार रूपी पांच विकारों का त्याग कर, मन और बुद्धि को पूरी तरह से निराकार परमपिता परमात्मा शिव में एकाग्र करती है, तब उसे ईश्वर की प्राप्ति होती है।
दीदी ने स्पष्ट किया कि तीजा पर रखा जाने वाला ‘निर्जला और निराहार’ व्रत केवल स्थूल अन्न-जल का त्याग नहीं है। इसका वास्तविक संदेश है—मन में चलने वाले व्यर्थ और नकारात्मक संकल्पों पर पूर्ण विराम लगाना। जब हम ईश्वरीय ज्ञान के आधार पर अपनी आसुरी वृत्तियों और अशुद्ध इच्छाओं का त्याग करते हैं, तभी हमारी आत्मा का शुद्धिकरण होता है। आज के समय में मन को ईर्ष्या, द्वेष और चिंता से मुक्त रखना ही सच्चा निर्जला व्रत है।
दीदी ने कहा कि पर्व के नाम ‘हरतालिका’ का विश्लेषण करते हुए बीके स्वाति दीदी ने बताया कि इसका अर्थ है सखियों द्वारा किया गया हरण। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, जब दिव्य गुण और शक्तियाँ ईश्वरीय ज्ञान रूपी सखियाँ हमारी बुद्धि को कलयुगी समाज के मायावी और तामसिक वातावरण से हरण कर अर्थात निकालकर परमात्मा की एकांत याद में ले जाती हैं, तब जीवन में सच्ची सुख-शांति आती है।
तीजा के अवसर पर महिलाओं द्वारा किए जाने वाले सोलह श्रृंगार पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि स्थूल आभूषण शरीर की शोभा बढ़ाते हैं, लेकिन आत्मा का वास्तविक श्रृंगार दिव्य गुण हैं। पवित्रता, शांति, प्रेम, आनंद, ज्ञान, शक्ति और पवित्रता रूपी आभूषणों से सुसज्जित आत्मा ही सदा सुहागिन यानी ‘सदा सुखी’ रह सकती है। मस्तक पर लगाई जाने वाली बिंदी हमें याद दिलाती है कि हम भृकुटी के बीच चमकने वाली एक दिव्य अजर-अमर आत्मा हैं। इस पावन पर्व पर राजयोग मेडिटेशन के माध्यम से स्वयं को परमात्मा शिव से जोड़ें। वर्तमान समय में जब चारों ओर नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है, तब आत्म-जागरण और परमात्मा की याद ही एकमात्र सहारा है। यदि प्रत्येक मनुष्य अपने भीतर की सुप्त शक्तियों को जगाकर पवित्रता का व्रत ले, तो पुनः इस धरा पर सतयुगी सुख, शांति और अखंड सौभाग्य के साम्राज्य की स्थापना हो सकती है।
दीदी ने बताया कि तीजा व्रत की शुरुआत से ठीक एक दिन पहले कड़वा भात खाने की परंपरा है। यह कड़वा भोजन इस बात का प्रतीक है कि ज्ञान मार्ग पर चलने और परमात्मा से मिलन की इस ऊंची तपस्या, तीजा व्रत को शुरू करने से पहले, हमें अपने भीतर मौजूद कड़वाहट—जैसे ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, कड़वे बोल और पुरानी बुरी आदतों को हमेशा के लिए चखकर छोड़ देना है। कड़वी चीजों को खाने का मतलब है कि आत्मा अब संसार के झूठे, मीठे और नश्वर आकर्षणों से मुख मोड़ रही है। जब तक हम पुरानी कड़वी आदतों का अंतिम विसर्जन नहीं करते, तब तक हम पवित्रता के कठिन मार्ग पर अडिग नहीं रह सकते।
तीजा की इस कठोर तपस्या और निर्जला व्रत के तुरंत अगले दिन गणेश चतुर्थी मनाया जाता है। इसका आध्यात्मिक रहस्य बहुत गहरा है। जब कोई आत्मा तीजा के आध्यात्मिक रहस्य को समझकर अपने विकारों का उपवास अर्थात त्याग करती है और राजयोग के द्वारा स्वयं को परमात्मा शिव से जोड़ लेती है, तो वह आत्मा स्वयं ‘विघ्नविनाशक’ बन जाती है। गणेश जी विघ्नहर्ता हैं, जो इस बात का प्रतीक हैं कि सच्ची तपस्या के बाद मनुष्य के जीवन से सारे विघ्न-बाधाएं स्वतः समाप्त हो जाते हैं।

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