
【3 दिसंबर पुण्यतिथि विशेष】
हरि ठाकुर का उत्तरवर्ती काव्य एवं उसकी पृष्ठभूमि:
डाँ. बलदेव
आज नंगई का जमाना है, जो आदमी जितनी नंगाई कर सकता है, भुजा की ताकत दिखाकर लूट मार कर सकता है, जघन्य हत्याए कर सकता है, और कूट-बुध्दि के भाई को भाई से भिड़ा सकता है, अपनी क्रोधाग्नि से गांव का गांव जला सकता है, चाणक्य नीति के अनुसार सोए हुए बाप की गर्दन काट सकता है, सत्ता के कारण,वही व्यक्ति , सफल नेता सफल अफसर और सफल व्यापारी हो सकता है। इन्हीं लोगों के इर्दगिर्द सत्ता घूमती है। ये ही पर पीड़क,वंचक और लम्पट लोगों के कारण राजनीति अत्यंत दूषित हो गई है, धर्म राक्षस जैसा ताकतवर हो गया है, इनके सामने साहित्य की क्या औकात? छत्तीसगढ़ का मुक्ति मोर्चा शुरू में साहित्यकारों व्दारा चलाया गया था छत्तीसगढ़िया लोगों के स्वाभिमान को जगाने के लिए पं. सुन्दर लाल शर्मा, लोचन प्रसाद पांडेय, बंशीधर पांडेय ने यज्ञ प्रांरभ किया था। हीरू के कहिनी उपन्यास का मंगलाचरण देखिए:- आल्हा छंद से किस प्रकार शुरु होता है-
ते छत्तीसगढ़ ला सब लोग
हांसत हावैं ताली ठोंक
आगू जूता पाछू बात
ऐसन हाना जो हबैं
ऐ छत्तीसगढ़िया भाई मन
अपन जगा के निंदा अइसन
सुन के हम चुप हो जाबो
तो का हम मनुज कहाबो?
डाँ. खूबचंद बघेल (नाटक-लेखक),हरिठाकुर, केयूर भूषण, विमल पाठक, और लक्ष्मण मस्तुरिया जैसे साहित्यकारों से ही जन जागरण का काम शुरू हुआ था। दो, चार उत्साही नेताओं ने भी इस कार्य में सहयोग करना चाहा तो राजनीति की छूत ने उन्हें कुमार्गी बना दिया। सत्ता हस्तांतरण का खेल अलग होता है, और जन आन्दोलन का राग बिलकुल अलग होता है। जन आन्दोलन का पहला काम है , स्वाभिमान को जगाना पड़ता है। शोषण और अन्याय के कारणों की जाँच कर उसके विरुद्ध जन - मत तैयार किया जाता है। मुक्ति मोर्चा में बहुत कम लोगों ने भाग लिया था, इसे सभी जानते हैं। राजनीति के छल छद्म को दो चार चतुर खिलाड़ी साहित्यकार अवश्य समझते हैं, और ऐसे लोगों को सत्ता में शामिल भी किया जाता है, अन्यथा स्वयं शामिल होने की जुगाड़ करते रहते हैं, उन्हें बस मौके की तलाश रहती है लेकिन हरिठाकुर जैसे निष्काम योध्दा को ये लोग नजदीक नहीं आने देंगे, अगर योग्य व्यक्ति इनके नजदीक जाना भी चाहेंगे, तो ये उन्हें धकिया देगें, पास फटकने न देगें। हरिठाकुर ने इस बात को स्पष्ट कर दिया था- राजनीतिक दलों का छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण का मुद्दा भले ही चुनावी हो, किंतु छत्तीसगढ़ियों के लिए यह जीवन और मरण का मुद्दा है। छत्तीसगढ़ के स्वाभिमान की रक्षा का मुद्दा है, उसकी सांस्कृतिक और सामाजिक संरचना के अनुरूप विकास का मुद्दा है ,शोषण और प्रदूषण से मुक्ति का मुद्दा है। हमारी लड़ाई इस ध्येय के लिए है किसी श्रेय के लिए नहींः
छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के बाद भी हरिठाकुर की लड़ाई इन मुद्दों को लेकर जारी रही और आखिरी सांस तक वे शोषण के खिलाफ , अन्याय के खिलाफ, भय के खिलाफ याने 'अंधेरे' के खिलाफ उनका पौरुष , विश्वास के बादल और गीत के शिलालेख हुंकृति भरते रहे। उनका संघर्ष उनका विश्वास उनका काव्योल्लास कभी कमजोर नहीं पड़ा। हरिठाकुर दघीचि थे , उनकी हड्डी को बज्र बनाकर हमारे साहित्यकार साथी सरस्वती के सपूत सदैव आगे बढ़ते रहेंगे।
छत्तीसगढ़ साहित्य समिति रायपुर के प्रथम छत्तीसगढ़ प्रान्तीय सम्मेलन में करीब दर्जन भर किताबों का विमोचना हुआ, उसमें एक किताब हरिठाकुर की भी थी । वहाँ हरि ठाकुर , बबन मिश्र, लक्ष्मण मस्तुरिया का अभिनंदन हुआ, और केयूर भूषण तथा मौत के मुंह से निकले हुए व्हील चेयर से जड़े मुक्ति मोर्चा के नायक डॉ . विमल कुमार पाठक का भी सम्मान किया गया । -छत्तीसगढ़ के कोने कोने से ख्यात अख्यात , नये- पुराने , परिचित , अपरिचित साहित्यकारों का जमावडा दूधाधारी मठ के सभा गृह को हुआ था । एक ओर तो इनमें नये राज्य गठित होने की खुशी थी , तो दूसरी ओर छत्तीसगढ़ी को राजभाषा बनाने विषयक संकल्प | वक्ताओं की बाते सुनने में कब सुबह से शाम और शाम से आधी रात हो गई पता नहीं चला । दूसरे दिन तड़के सुबह में ठाकुर जीवन सिंह को लेकर ‘ हरिमिलन ‘ को उनके निवास पर पहुंचा । हरि ठाकुर निर्धारित समय के अनुसार हम लोगों का ही इंतजार कर रहे थे । डर रहे थे कही देरी तो नहीं हो गयी । शिष्टाचार के बाद थाली में तिल का लड्डू टेबिल पर आ गया, उसी समय कुछ और मित्र भी बैठक में पहुंचे हम दो व्यक्ति एक दूसरे को पहिचान को पहिचानने की कोशिश कर रहे थे कभी दिल्ली काफी हाउस में मिलती थे , बीस पच्चीस वर्षों में भूल से गए थे । हरि भैय्या ‘ सहदानी में सभी को पुस्तकें भेंट कर रहे थे , किताब बांटने में भैय्या जी, हरिश्चन्द्र से कम नहीं थे । मुझे तो उन्होंने अपनी किताबों को साथ अन्य कई किताबे दी, जो छत्तीसगढ़ी संस्कृति आन्दोलन – से संबंधित थी,परन्तु मुख्य थी , उन्हीं की कृति ‘धान का कटोरा’ और ‘वाणी है अनमोल ‘ दोनों किताबों के प्रकाशन के बीच एक लम्बी और गहरी लकीर खींची हुई है । इस पार एक नव गठित छत्तीसगढ़ राज में शोषण से उपजे आक्रोश ,अपमान, अन्याय के विरुद्ध शंखनाद है , तो दूसरी और प्रार्थना , प्रसन्नता , विश्वास एक तरफ ओज, का प्रवाह है तो दूसरी ओर माधुर्य का विलास एक तरफ मारु राग है तो दूसरी ओर डफ और नगाड़े पर चढ़ा हुआ फाग । एक ओर आवेग युक्त छंद है तो दूसरी ओर लोक रागिनी । इन दोनों ही कृतियों में हरि ठाकुर की पिछला ( भूत और वर्तमान मनास्थिति वीर भावना और श्रृंगार के प्रति आसक्ति को छत्तीसगढ़ी भाषा संस्कार के साथ देखा जा सकता है ।
धान के कटोरा
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छत्तीसगढ़ राज बनने के एक डेढ़ वर्ष पूर्व 'धान का कटोरा , काव्य संकलन प्रकाशित हुआ था। संकलित रचनाएं नवें और दसवें दशक में लिखी गयी थी । धान के कटोरा में सेनानी कवि हरि ठाकुर ने अमर शहीद वीरनारायण सिंह खंडकाव्य के कई स्थलों को स्वतंत्र कविता के रूप में शहीद वीरनारायण सिंह ,ओकर प्रण , रणोन्माद , ललकार , सोना खान के आगी और 'ओकर संसो' शीर्षक से संकलित किया है ।, इस बैलेड के बारे में हम बहुत पहले उसकी भूमिक के रूप में विस्तार से लिख चुके है, यहाँ पिष्ट -पेषण उचित नहीं । यहाँ सिर्फ इतना कहना ही उचित होगा कि हरिठाकुर इस वीर काव्य को हथियार के रूप में इस्तेमाल करते थे । हरिठाकुर क्रांति दृष्टा अग्रदूत के साथ ही साथ भविष्य दृष्टा भी थे , वे छत्तीसगढ़ राज के स्वप्न देखने वाले त्यागमूर्ति प्यारे लाल ठाकुर के लाड़ले सुपुत्र थे । धान के कटोरा विशुद्ध जागरण गीत है उसमें और जमीनी लड़ाई में फर्क है । एक छत्तीसगढ़ी मनुष्य के हृदय में स्वाभिमान की भावना को भरता है , शोषण और अन्याय के खिलाफत करने का आह्वान करता है दूसरा भीड़ के मनोबल पर निर्भर है, यहाँ हरिठाकुर भीड़ का नहीं 'जन' का आह्वान करते हैं जिसमें सोच और विचार की भरपूर शक्ति होती है । अन्याय और शोषण से युक्त देश में हरिठाकुर की आत्मा अशान्त है ।
येहर सुराज नोहय
जेखर खातिर
पुरखा मन बलिदान दीहिन
हरि ठाकुर यहाँ देश की आत्मा को जगाने की कोशिश करते हैं जिससे उनकी उफनती हुई भावना शब्द में प्रतिबिंबित होती है-
अंटिया से बन बइहा पूरा
बह जाय प्रदूषण के कचरा
बूड जाय सबे लंदी-फंदी
इतने स्वच्छ पावन धरती में प्रदूषण कौन फैला रहा है लंबी फंदी कौन है धान के कटोरा को सीमेंट के बोरे में कौन तब्दील कर रहा है, यही हमारे दुश्मन हैं हमारी लड़ाई इन्हीं से है। ये जंगल को काट काट कर खनिज का अवैध उत्खनन कर अपनी तिजोरी भर रहे हैं, यह वही लोग हैं जो हमारे बच्चों का 'कौर" छीन रहे हैं ।
कहाँ ले आथें
झटकुंन रोजगार पा जाथे
छत्तीसगढ़ के लइका
रोजीरोटी बर लुलुवात हें
यही परदेसी लोग हमारे घर घर में फूट डालते हैं, हमारे वोटों की फसल ये ही चरते हैं । छत्तीसगढ़ियों का शोषण केवल व्यापारी ही नहीं करते उद्योगपति ही नहीं करते बल्कि यहां के नेता और अफसर भी करते हैं, इनमें हमारे छत्तीसगढ़िया भाई भी शामिल हैं, क्योंकि इनके हाथ में शासनहै, हरि ठाकुर इनके ' आदर्श' तथा गंदी राजनीति को स्पष्ट करते है-
गांधी जी के जै बोलवाय
पर्यावरण के दिवस मनाय
जंगल उही मन कटवाय
आदर्श और व्यवहार में कितना अंतर है इसलिए कवि इन धूर्तों दोगलों के विरुद्ध छत्तीसगढ़िया मतदाता को उनकी सलाह है-
पानी पीयत छान के
नेता चुनय जान के
इसी प्रकार के कई कहावतों, मुहावरों को हरि ठाकुर ने व्यंग्य की शैली में ढालकर एकदम नया बना दिया है। कठिन संघर्षों के दिनों में भी हरि ठाकुर छत्तीसगढ़ी भाषा को धार देते रहे हरि ठाकुर के अनुसार ठग या लालच देकर व्होट मांगने वाला व्यक्ति "पर लोखिया" (कृतध्न, लालची) हरि ठाकुर ऐसे लोगों का मुखौटा उखाड़ देते हैं इन पर कभी दया भाव नहीं रखते :-
बघवा बन के गरजत रइथे
छत्तीसगढ़ मा सांसद मन
मौनी बन के दिल्ली म
सुतथे चादर तान के
यही लोग छत्तीसगढ़ के विकास में "बिजूक्खा" है । धोखेबाज हैं, अड़चन डालने वाले हैं। छत्तीसगढ़ में शोषण के कई तरीके हैं। बड़े-बड़े कल खानों से जंगल और खेतों से बेदखल होती जा रही है यहां हीरे की चोरी शुरू से हो गयी है, कवि की तीक्ष्ण दृष्टि उधर भी है, वे हमारी आंखों को खोल देते हैं-
लोहा डोहारिन , कोयला डोहार डारिन
अउ काट काट के जंगल जमो उजार डारिन
नजर अब हावैं अब तोर हीरा म
ये सभी "दही के साखी बिल्लइया" हौं, ये धूर्त बेइमान नेता सीधा रस्ता कभी नहीं जानते। ये हमारे कंधों पर चढ़कर ही सत्ता का आस्वादन कर सकते हैं। फल का असली भाग (गुदा-गुदा) ये खाते हैं और छिलका हमारे ऊपर फेंकते हैं। आज इन्हीं कायर कपूतों के कारण हमारी दुर्गति हो रही है। छत्तीसगढ़ी महतारी इन्हें अपना बेटा समझ अपना दुख गोहराती है ,पर ये उस पर विश्वास नहीं करते इससे बड़ा संकट छत्तीसगढ़ियों के लिए और क्या हो सकता है। नेताओं को कवि की चेतावनी है-
छत्तीसगढ़ म अइसन नेता मन के गंजाए हे खरही
अब उंकर नेतागिरी ल सोझियाये बर परही
नई थामै जे नेता, छत्तीसगढ़ राज आंदोलन के
बागडोर
तउन करना परही बाहिर अउ करना परही उंकर
कायरता ला जगजाहिर…..
आज ऐसे ही झूठे और बेईमान नेताओं की बात पर हमारे ही पत्तल चाटने वाले हमें ही भूंक रहे हैं । ये शोषक हमें ही ढोर- डांगर बना रहे हैं, हमारे उत्पीड़न की कहां तक वर्णन किया जाय। छत्तीसगढ़ी मनुष्य तो इतना डर गया है कि त्राहिमाम के सिवाय और एक लब्ज़ भी नहीं बोल सकता -
कतको बदल गे ठाकुर जनतंत्र मा जमाना
सब नेता वाला नेता बदनाम नजर आत हे
धन दौलत की नुकसानी उतनी बड़ी नुकसानी नहीं है जितनी बड़ी हानि लोक संस्कृति की हो रही है, उसकी क्षति- पूर्ति नहीं हो सकती। छत्तीसगढ़ की अस्मिता को बचाने के लिए हरि ठाकुर भाषा को बड़े तेज धार हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं -
अपन भाषा बाचें रहही
त हमर पहिचान घलो बांचही
नहीं त हमूं मन कचरा मा मिंझर जाबो
हरि ठाकुर के शब्द काफी नुकीले और मार करने वाले हैं, हर साल सूखा या पनिया अकाल और पलायन छत्तीसगढ़ की नियति है, पलायन तो अनेक प्रयत्नों के बाद भी नहीं रुकता। सरकार की निराली रीति है कि कोई भी भूखा मत मरे और नेताओं का आकाल- उत्सवमी कभी बंद न होवे। इसी प्रकार छत्तीसगढ़ में उद्योगों की दिन- दूनों,रात-चौगुनी बढ़ोत्तरी हो रही है वह भी रोके नहीं रुक रही है, कई जगह आंदोलन होते हैं परंतु उसे बूटों से रौंद दिया जाता है ,उद्योग रोग जैसा बढ़ रहा है इससे खेत और जंगल नष्ट हो रहे हैं, कवि के शब्दों में -
"भस्मासुर उद्योग खुल रहे
छत्तीसगढ़ ला लीले बर"
समाज में दारू ,जुआ, ऊंच-नीच, जाति धर्म का भेदभाव चरम सीमा पर पहुंच गया है, इसे मिटा कर ही नई व्यवस्था , नव निर्माण के लिए की जा सकती है।
इसके लिए एकता जरूरी है। नए सिरे से सिंचाई की व्यवस्था करनी पड़ेगी , फसलों के राजा धान को भरपूर पानी चाहिए, पुनर्निमाण और दुख के उच्छेद के लिए कवि खूनी क्रांति तक का समर्थक है। उनका आह्वान है-
अब शोषण अन्याय सहे ले काम नहीं चलने वाला
धधक-धधक के अब तो हमला आगी असन बकरा
– ना हे
अब छत्तीसगढ़ राज बनाये बर जीना अउ मरना हे
पूरखा मन के सपना ला अब हमला पूरा करना हे
उपर्युक्त पंक्तियों राम अधारी सिंह दिनकर की हुंकृति के तुल्य है। ' धान के कटोरा' के छंद अद्भुत लय में बंधे हैं उसकी भाषा मैं ओजगुण की प्रधानता है, उसमें शिल्प का अतिरिक्त आग्रह करना अर्थहीन है, क्योंकि जहां दो करोड़ छत्तीसगढ़ियों के जीवन मरण का सवाल हो कला के लिए रच-रचाव के लिए अवसर ही कहाँ है, यहां तो कौवे का निशाना ठीक चिड़ए की आँख पर है, उसके सिवाय और कुछ नहीं । इसी कारण धान का कटोरा का मुख्य स्वर छत्तीसगढ़ मुक्ति आंदोलनही है, और इसी संदर्भ में इस कृति को देखना चाहिए।
कवि का विश्वास सत्य के करीब होने के कारण अमर होता है , उसका स्वर संधान अचूक होता है । हरि ठाकुर और उसके सहयोगियों का 'छत्तीसगढ़ राज्य' का स्वप्न पूरा हुआ, अब देखना यह है कि इस परिवर्तन से छत्तीसगढ़ियों के जीवन में क्या परिवर्तन आएगा। यह हमारे लिए दूसरा स्वराज्य है किंतु जैसे सांप सांप वैसे नागनाथ की कहावत चरितार्थ न होने लगे, और इसकी संभावना ज्यादा है। अस्तु साहित्य को राजनीति पर निरंतर दबाव बनाए रखना चाहिए। जिस प्रकार हरि ठाकुर इस आंदोलन के केन्द्र में थे, और जो इधर उधर नहीं परन्तु उनके इस आंदोलन से कई 'महापुरुष' सत्ता के सुख लूटने पुनः वापिस आ चुके और कई जने प्रत्याशा में टकटकी लगाए बैठे हुए हैं।
वाणी है अनमोल
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दूसरा संकलन बानी हे अनमोल में 'छत्तीसगढ़ राज्य के सपना' साकार होने के बाद का उमंग है उल्लास और उजास है । पिंजरा में कैद रहे स्वतंत्र पंछी की मुक्त उड़ान है। प्रभु की प्रति कृतज्ञता है, भक्ति निर्वेद स्वर में 'हपटे - गिरे -पड़े' मनुष्य के प्रति मंगल कामना है । जिसमें सूर, मीरा, तुलसी के परम्परागत पदों का छत्तीसगढ़ी में एक प्रकार से नया संस्करण है, कुछ नई बातें कहने का कुछ नया अंदाज है । यहां ऋतु चक्र का विधायक गणनायक होगा, सरस्वती से कवि वरदान न मांग कर , छत्तीसगढ़ियों के भाग्य संवारने की ओजपूर्ण शब्दों में विनती है साथ ही अपात्रों का भाग्य - विधात्री 'महारानी' लक्ष्मी से दरिद्रय, विपदा तथा अशांति हटाने की प्रार्थना है। उसी प्रकार प्रकृति - पुरुष, शिव और शिवा की भी आरती है। देवी- देवताओं की पूजा अर्चना के बाद दुर्गा लक्ष्मी और सरस्वती स्वरूपा छत्तीसगढ़ी महतारी का जयगान है-
छत्तीसगढ़ महतारी के जेवनी हाथ म हँसिया हे
डेरी हाथ म धान के बाली तिसर हाथ तिरसूल हे
अउ चौथा हाथ म पोथी हे।
यह भवा- भावना सर्वभूतेषु दुर्गा,लक्ष्मी, सरस्वती आदि रुपेश संस्थिता' जैसे 'आवेश' है, यहां हरि ठाकुर की भव्यता में विशेष मंगल भाव निहित है। वाणी है अनमोल हरि ठाकुर के उत्तरा पथ की काव्य - यात्रा है। जिसमें पौराणिक पुरस या अवतारी पुरुषराम और कृष्ण जैसे अनमोल धन से इस भवसागर से पार लगाने की प्रार्थना है, गोपियों से रास रचाने वाले ब्रह्मचारी से भी प्रार्थना है -
हर कदम्ब के डार पात
तुम चंचल पवन झकोर
हम तोर पिंजरा के मैना
झन तुम बनो कठोर
हमरे ऊपर कृपा तुम करिहा
बिनती हे कर जोर
तुम घनश्याम हमार तोर हम
हन जंगल के मोर!
हरि ठाकुर की ये रचनाएं भक्ति के अनमोल पद हैं । मनुष्य जब निष्काम हो जाता है, तभी उसके हृदय से भक्ति रस की धारा बहने लगती है।जीवन तो क्षण भंगुर है, प्रेम के बोल ही यहाँ 'सार' है। उनके शब्दों में-
ये माटी के मरकी एक दिन
फक ले जाही फूट
कर ले कतका जतन रे मनुवा
रहि जाही सब छूट
कब ले बांधे रहिबे गर मा
माया मोह के मोल
गुरतुर बानी बोला रे मनुवा
गुरतुर बानी बोल
इस भक्ति प्रधाना रचना में लगता है हरि ठाकुर एकदम वानप्रस्थी हो गए हैं, लेकिन यह बात नहीं है, वे निवृत्ति मार्गी न होकर प्रवृत्ति मार्गी कवि है। दरअसल छत्तीसगढ़ की मिट्टी में ही वह रूप,रंग,रस और सुगन्ध है कि वे एक क्षण के लिए अलग नहीं हो पाते,उनकी इस मुक्त उड़ान में पूरी मस्ती और आवेग है-
जोत कलस छलके लागिस, बूके रोरी रंग
चटके लागिस झूम के कली कली के जंग
चहके लागिन पेड़ मन, करे पखेरु सोर
छरा छिछावत देख के, जागे लागिस खोर
सूची भेद्य अंधेरा के बाद ज्योति कलश छलकने लगता है, धरती का अंग अंग गुलाल से भर गया है,
गोबर पानी का ‘छरा छिटका’ दिया जा रहा है ,धूल बैठने लगी है, सूर्य की किरणें तुलसी चौरे पर मस्तक झुका रही है, यहाँ आशा और विश्वास की कमी नहीं है, हर कहीं मंगल वर्षा हो रही है, किसान छोटे-छोटे जलाशयों (डबरों) में नहा रहा है, खुशी से झूम रहा है, गा रहा है। दशों- दिशाएं जल रंग हो गई है , धरती रसमय हो गयी है-
तरिया डबरा भर गे हे
मुंडा परबत झबरा बन गे हे
बादल से लिपटे .....पर्वत के लिए 'झबरा' (चितकबरा) बनने का बिम्ब यहाँ बड़ा ही सार्थक है । कभी 'चौमास ' की मस्ती और सुंदरता को ही नहीं देखता बल्कि उसके शक्तिशाली रूप का भी दर्शन कराता है -
भारत के नदिया हुंकार असन पसरत हे धार
मनखे ला घर मा देहिस खेड़ दिस झार खेतखार मेड़
अइसन झकझोरत हे पवन,अब गिरही तब गिरही पेड़
मूसलाधार, बारिश जब सीमा लांघ जाती है, तब साथ ही साथ ' पनिया दुकाल' को आना ही आना है।
ओदरत हे माड़ी
सटकत हे नाड़ी
बरखा अनाड़ी
ऐसे कठिन समय में अकाल का लक्षण दिखना ही, सत्ताधारियों का ध्यान आकर्षित कराना हरि ठाकुर का धेय है, कवि आस्तिक विचारधारा का है ,उसे ऊपर वाले के ऊपर बड़ा भरोसा है, आस्था और विश्वास है, अब उन्हें सांस लेने की थोड़ी सी फुर्सत मिली है वे छत्तीसगढ़ी भाषा के श्रृंगार के लिए भी थोड़ा वक्त निकाल लेते हैं रीतिकालीन कवियों का उन्हें 'आवेश' हो जाता है । चौमास के दृश्य के लिए और कवि ने टटके बिम्ब और प्रतीकों की झड़ी लगा देते हैं , कसे हुए छोटे कद के छंदों में-
पुरइन के पानी/ मोती धरे हवय अंजरी
महर महर करय/ अमुवा के मंजरी
पाटी पारे राधा जी के लहकत हे बेनी
लहकत हे बेनी जइसे सरग निसेनी
एक बार मुकुटधर जी ने हरिठाकुर की कवायद की एक खास विशेषता की ओर ईशारा करते हुए बतलाया था कि वे संज्ञा से क्रिया बनाकर खूब रचना करते हैं, कवि के साथ ही साथ यह छत्तीसगढ़ी की भाषिक विशेषता है। एक उदाहरण देखिए-
घम घम ले मउरे हे आमा
बगिया अउ बगियागे
यमक का भ्रम दिखाता हुआ यहां संज्ञा क्रियापद में रूपान्तरित होकर जादू सा जगा देती है। बीता हुआ समय लौटकर वापस नहीं आता, बुढ़ाने के लिए शरीर ही बुढ़ाता है। इसलिए जगत में परिवर्तन अवश्यभावी है। संयोग के बाद, वियोग ,वियोग के बाद संयोग, कवि अपनी विरहा वेदना भी नहीं भूल पाता। साढ़े तीन फीट के लंबे चौड़े अंधेरे कमरे में कवि हाथ पैर सिकोड़ कर हताश- उदास बैठा है, ऐसे समय कोई गली में होल्ले बकने लगे ( होली का यौन गंधी गीत) इसके बाद भी वह बाहर न निकले तो कोई उसे उलाहना देने लगे तो चारों ओर से नगाड़े बजने लगे तब वह कितने देर तक अंधेरे कमरे में घुसा रहेगा? बाहर तो चेलिक (युवा) गुलाल लेकर घूम रहे हैं , कवि तू बैठा है तो बैठे रह" इस उलाहने से विरह विदग्ध व्यक्ति के मन में भी प्रीत जगने लगता है वह लोक-लाज छोड़ कर महुवा का पानी (दारू) पी गया, उसे लगा डाल डाल में कुहू कुहू का बोल फूट रहा है, टेसू दहकने लगा है लाल लाल समूचा गांव होल्लहार बन गया है। कवि कंठ से कंठ मिलाकर गाने लगता है, नगाड़े पर चोट पड़ रही है-
बरसे रस के धार जँवरिहा
भीजे सब सिंगार जवरिहा
जंवरिहा फागुन म
लगता है कवि के नस-नस में फागुन की मस्ती भर गयी है । वाणी है अनमोल के अंत में सौ दोहे भी संकलित है, इसमें नीति,शिष्टाचार के सरल बोधगम्य, उपदेश प्रधान दोहे हैं, जो कहीं कहीं रहीम के दोहों का स्मरण करा देते हैं ,तो कभी-कभी श्रृंगार के ऐसे दोहे हैं जो बिहारी के दोहों की याद करा देते हैं। इन सबके बावजूद उसमें श्रृंगार के स्वस्थ और आकर्षक रूप के दर्शन होते हैं, शिथिलता या अश्लीलता के नहीं जो कि रीतिकाल की रचनाओं की एक बड़ी कमजोरी थी-शीलता का एक उदाहरण लीजिए-
शील बिना नारी लगै, जइसे जल बिन कूप
मेघ बिना सावन लगै, नीरस अउ कुरूप
प्रेम का निरूपण देखिए-
तन ला दिया बनाय के, तेल प्रेम के डार
मन के बाती बार के, कर जीवन उजीयार
रूप का दूसरा चित्र देखिए-
दर्पन दरपन के रहय , दरक जात हे काँच
जइसे जइसे परत हे, रूप राशि के. आंच
सौंदर्य निरूपण में हरि ठाकुर छत्तीसगढ़ी कवियों में बेजोड़ है-
निर्मल गोरी देह म, बेनी अस लहराय
जइसे चंदन रुख म, फनिधर हो लपटाय
* * *
लहकत सेंदूर माँग जस, कामदेव के तीर
बिन बेधे वो देह ला, देय करेजा चोर
दरअसल हरिठाकुर ने छत्तीसगढ़ियों की पीड़ा, प्रेम ,वेदना, करुणा, सौंदर्य श्रृंगार उन्मुक्त हास- विलास और उल्लास को आत्मसात कर लिया है। शाश्वत है ,अमर है?
प्रस्तुति:-बसन्त राघव
पंचवटी नगर,मकान नं. 30
कृषि फार्म रोड,बोईरदादर, रायगढ़,
छत्तीसगढ़,basantsao52@gmail.com मो.नं.8319939396