
केशव जी के पूर्व उपन्यासों मुई मरजानी,सज रही गली मेरी माँ वंशिका,मंझली,आया आदि को पढ़ने पर हर एक शब्द के मध्य उनका स्पष्ट और विचारशील, कल्पनाशील व्यक्तित्व नजर आता है।इसके अलावा उनकी चिंतन शक्ति एवं कल्पनाशीलता का भास मिलता है।मुझे ऐसा लगता है कि वे लिखते- लिखते सोचते हैं,पूर्व से सोचकर नहीं लिखते।
उनके पास शब्दों का विशाल भंडार है।उस भंडार से वे शब्दों का चयन कर साहित्य का संसार रचते हैं।उनके विचार की धारा किसी इठलाती नदी सा बहती हुई प्रतीत होती है। वह प्रवाह में पाठकों के हृदय की गहराइयों तक पहुंचता है।इस बीच पाठक खुद भी उस प्रवाह में हिलोरें लेता है।
“ज़ोर ए कलम बरकरार रहे
चले खूब और धारदार रहे।”
पाठकों को उनके नए उपन्यासों की प्रतीक्षा रहती है।हमारे शहर बिलासपुर की वे शान हैं।उनके शब्द-शब्द सार्थक एवं शाश्वत होते हैं।उनके उपन्यास का कथानक आसपास की कोई घटना लगती है और यही बात उन्हें अन्यों अलग तथा विशिष्ट बनाती है।
उनके नए उपन्यास के प्रकाशन के सुअवसर पर आत्मीय बधाई एवं अनेकानेक शुभ कामनाओं के संग…………..
डॉ.संजय मेहता
मेहता आई केयर
मसानगंज
बिलासपुर
छत्तीसगढ़