माँ का स्थान भगवान के बाद दूसरा — यशवंती दुहन

ब्रह्माकुमारीज़ के शिव अनुराग भवन में संघर्षशील मातृशक्ति का हुआ सम्मान…

बिलासपुर। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर राजकिशोर नगर स्थित ब्रह्माकुमारीज़ के शिव अनुराग भवन* में आयोजित एक विशेष आध्यात्मिक समारोह में हरियाणा से पधारी *यशवंती दुहन* ने अपने प्रेरणादायी उद्बोधन से उपस्थित जनसमूह को भावविभोर कर दिया। वे एसईसीएल के सीएमडी हरीश दुहन की माताजी हैं और कई दशकों से आध्यात्मिक मार्ग पर चलते हुए समाज सेवा में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

अभिमान ईश्वर का शत्रु है…
अपने उद्बोधन में यशवंती दुहन ने विशेष रूप से बच्चों और युवाओं को संस्कारवान बनने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि जीवन में कभी भी अभिमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि अभिमान मनुष्य को ईश्वर से दूर कर देता है। उन्होंने समझाया कि किसी को अपशब्द कहना या क्रोध करना आत्मिक उन्नति में सबसे बड़ा बाधक है।

दुहन माताजी ने कहा कि यदि आज के भौतिकवादी युग में भी बच्चे अपने माता-पिता को भगवान के बाद दूसरा स्थान देते हैं, तो यह ईश्वर की बहुत बड़ी कृपा है।

आध्यात्मिक सेवा और त्याग की प्रेरक मिसाल…

माताजी ने अपने जीवन के अनुभव साझा करते हुए बताया कि वर्ष 1981 में ईश्वरीय ज्ञान से जुड़ने के कुछ ही दिनों के भीतर उन्होंने अपने घर में गीता पाठशाला प्रारंभ कर दी थी। लगभग 9–10 वर्षों तक उन्होंने अपने घर से ही सेवा केंद्र का संचालन किया और मधुबन (माउंट आबू) में भी लंबे समय तक रहकर निस्वार्थ सेवा की। उन्होंने कहा कि सच्ची सेवा वही है जो निस्वार्थ भाव से और बिना किसी दिखावे के की जाए।

नारी शक्ति का गौरव…
इस अवसर पर सेवा केंद्र प्रभारी **ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी** ने यशवंती माताजी का सम्मान करते हुए उन्हें *शेरनी शक्ति* की संज्ञा दी। उन्होंने कहा कि “नारी नहीं तू अंबा है” — जब नारी अपने श्रेष्ठ आचरण और संस्कारों से जीवन जीती है, तब वह समाज के लिए प्रेरणा बन जाती है। माँ ही वह शक्ति है जो अपने बच्चों को संस्कारवान और शक्तिशाली बनाती है।

संघर्षशील महिलाओं का हुआ सम्मान

समारोह के दौरान समाज की ऐसी महिलाओं का भी सम्मान किया गया, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने परिवार को श्रेष्ठ संस्कारों के साथ आगे बढ़ाया है। इसमें टिकरापारा निवासी जयाकुमारी ने सब्जी बेचकर अपने तीन बच्चों की परवरिश की वहीं शनिचरी की सरोजनी माता ने भी इस व्यवसाय से घर को स्थिर किया।

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