
मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जी के चरित्र दी जा रही जीवन प्रबंधन की सीख.

शिव-अनुराग भवन’ में 7 दिवसीय रामायण श्रृंखला का भव्य शुभारंभ
बिलासपुर, 19 मार्च:हिन्दू नववर्ष, गुड़ी पड़वा एवं चेटी चाँद के पावन अवसर पर ब्रह्माकुमारीज़ द्वारा रामायण का आध्यात्मिक महत्व एवं जीवन प्रबंधन’ विषय पर 7 दिवसीय विशेष आयोजन का भव्य शुभारंभ किया गया। कार्यक्रम के प्रथम दिवस पर ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी जी ने रामायण के गूढ़ रहस्यों को व्यावहारिक जीवन से जोड़ते हुए संबंधों के प्रभावी प्रबंधन पर सारगर्भित विचार व्यक्त किए।
आत्मा की यात्रा और जीवन प्रबंधन का रहस्य
मंजू दीदी ने अपने उद्बोधन में कहा कि ‘रामायण’ का वास्तविक अर्थ ‘आयन’ अर्थात यात्रा है—यह प्रत्येक आत्मा (आत्माराम) की आंतरिक यात्रा का प्रतीक है। उन्होंने संबंधों को निभाने की कला को दीपक और बीज के उदाहरण से स्पष्ट करते हुए कहा कि जैसे दीपक को निरंतर तेल और संरक्षण की आवश्यकता होती है, वैसे ही संबंधों को प्रेम, धैर्य और निरंतर देखभाल की आवश्यकता होती है।
दशरथ और अयोध्या का आध्यात्मिक विश्लेषण
रामायण के पात्रों का आध्यात्मिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करते हुए उन्होंने बताया दशरथ अर्थात् वह अवस्था जहाँ व्यक्ति अपनी 10 इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखता है। अयोध्या मन की वह स्थिति है जहाँ किसी प्रकार का आंतरिक संघर्ष या ‘युद्ध’ नहीं होता। तीन रानियाँ कौशल्या-कुशलता, कैकेयी-प्राप्ति और सुमित्रा-सर्व के प्रति स्नेह का प्रतीक हैं। चार भाई राम-ज्ञान, भरत-योग व समर्पण, लक्ष्मण-धारणा और शत्रुघ्न-सेवा के प्रतीक हैं।
संबंधों को मधुर बनाने के 10 प्रबंधन सूत्र
दीदी ने जीवन प्रबंधन के महत्वपूर्ण मंत्र साझा करते हुए कहा:राइट से फाइट अर्थात् अधिकार की भावना संघर्ष को जन्म देती है। मिसअंडरस्टैंडिंग से एंडिंग– गलतफहमी संबंधों को समाप्त कर देती है। फ़्लैशबैक से ड्रॉबैक– पुरानी बातों को दोहराना संबंधों की कमजोरी है। एडजस्टमेंट से अचीवमेंट – समायोजन ही सबसे बड़ी उपलब्धि है। सैक्रीफ़ाइस से प्राइस – संबंधों को बनाए रखने के लिए त्याग आवश्यक है। ऐसे अन्य 5 और सूत्र बताये
कुमारी शिवानी द्वारा मेरे घर राम आए हैं गीत पर प्रस्तुत नृत्य ने वातावरण को भाव-विभोर कर दिया। अंत में सभी ने एकाग्र होकर निराकार परमात्मा की याद में गहन शांति का अनुभव किया।