परिवार और कार्यस्थल को बनाएं “नो एंगर ज़ोन” – बीके स्वाति दीदी

17 मई 2026, बिलासपुर।
आज के तनावपूर्ण और भागदौड़ भरे जीवन में क्रोध मानव जीवन की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक बनता जा रहा है। छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा, रिश्तों में दूरी, मन की अशांति और स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव—यह सब क्रोध के दुष्परिणाम हैं। इसी विषय पर प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय, बिलासपुर की मुख्य शाखा, टेलीफोन एक्सचेंज रोड स्थित राजयोग भवन में आयोजित विशेष कार्यक्रम में सेवाकेंद्र की संचालिका बीके स्वाति दीदी ने क्रोध से मुक्ति का सहज और व्यावहारिक मार्ग बताया।
बीके स्वाति दीदी ने कहा कि जैसे शिव पर अक का फूल चढ़ाया जाता है, वैसे ही हमें अपने जीवन से क्रोध रूपी अक का फूल परमात्मा को अर्पण करना चाहिए। यह अर्पण बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक है—अपने स्वभाव और व्यवहार में परिवर्तन लाने का संकल्प। क्रोध अचानक नहीं आता, बल्कि इसके पीछे विचारों की एक श्रृंखला होती है। जब मन में बार-बार व्यर्थ विचार चलते हैं—जैसे “मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ?”, “दूसरा ऐसा क्यों करता है?”—तो यही विचार धीरे-धीरे ईर्ष्या, असंतोष और अंततः क्रोध का रूप ले लेते हैं। इसलिए क्रोध पर नियंत्रण का पहला कदम है—अपने विचारों को शुद्ध और सकारात्मक बनाना।
बीके स्वाति दीदी ने कहा कि आज का मनुष्य ‘क्यों’ शब्द का अत्यधिक प्रयोग करने लगा है। यह ‘क्यों’ शब्द मन को उलझाता है और अशांति को जन्म देता है। इसके स्थान पर यदि हम ‘ठीक है’, ‘मैं स्वीकार करता हूँ’ या ‘मैं समाधान ढूंढूंगा’ जैसी भाषा अपनाएं, तो मन स्वतः हल्का हो जाता है। भाषा के इस छोटे से परिवर्तन से व्यवहार और संबंधों में बड़ा बदलाव आ सकता है। क्रोध केवल दूसरों को नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि सबसे पहले स्वयं को कमजोर करता है। क्रोध के समय मनुष्य अपने विवेक और निर्णय शक्ति को खो देता है। ऐसे में गलत शब्द निकल जाते हैं और बाद में पछतावा होता है। इसलिए सच्ची शक्ति चिल्लाने में नहीं, बल्कि शांत रहने में है।
बीके स्वाति दीदी ने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे नो स्मोकिंग ज़ोन, नो पार्किंग ज़ोन, साइलेंस ज़ोन बनाए जाते हैं ताकि व्यवस्था, स्वास्थ्य और शांति बनी रहे, उसी प्रकार अब समय की माँग है कि हम अपने जीवन को “नो एंगर ज़ोन” बनाएं। उन्होंने बताया कि जब मन, घर और कार्यस्थल क्रोध-मुक्त होते हैं, तो वहाँ स्वतः सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। ऐसे वातावरण में बाधाएँ टिक नहीं पातीं और जीवन तथा स्थान स्वतः ही निर्विघ्न बन जाते हैं। यदि हर व्यक्ति स्वयं को “नो एंगर ज़ोन” बना ले, तो परिवार, समाज और राष्ट्र में शांति और सहयोग सहज रूप से स्थापित हो सकता है।
बीके स्वाति दीदी ने कहा कि यदि हम चाहते हैं कि समाज में शांति, प्रेम और सौहार्द बढ़े, तो इसकी शुरुआत हमें स्वयं से करनी होगी। जब एक व्यक्ति क्रोध छोड़ता है, तो उसका प्रभाव पूरे परिवार और समाज पर पड़ता है। क्रोध-मुक्त व्यक्ति स्वयं भी सुखी रहता है और दूसरों के लिए भी प्रेरणा बनता है।
कार्यक्रम के अंत में सभी उपस्थितजनों ने सामूहिक रूप से यह दृढ़ संकल्प लिया कि वे अपने जीवन में क्रोध को स्थान नहीं देंगे, बल्कि स्वयं को क्रोध-मुक्त, शांत और संयमित व्यक्तित्व के रूप में विकसित करेंगे। उन्होंने यह निश्चय किया कि हर परिस्थिति में प्रतिक्रिया देने के बजाय समझदारी और आत्म-नियंत्रण का मार्ग अपनाएंगे तथा अपने विचार, वाणी और व्यवहार से शांति का वातावरण बनाएंगे।

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