जयंती पर स्मरण किये गए पूर्व अध्यक्ष स्व. मन्नूलाल त्रिवेदी जी

कान्यकुब्ज ब्राह्मण समाज, रायपुर द्वारा आज पूर्व अध्यक्ष स्व. मन्नूलाल त्रिवेदी जी की जयंती आशीर्वाद भवन के कांफ्रेंस हॉल में आयोजित की गई। कार्यक्रम का प्रारंभ उपस्थित पदाधिकारी, कार्यकारिणी सदस्य एवं अतिथियों द्वारा त्रिवेदी जी के छायाचित्र पर पुष्पाजंलि अर्पित कर सादर स्मरण एवं नमन किया गया। कार्यक्रम में अध्यक्ष अरुण शुक्ल जी ने अपने उद्बोधन में बताया कि इस कार्यकाल में समाज अपने पूर्व अध्यक्ष एवं पूर्व सचिवों की जयंती पर स्मरण करने की परम्परा चालू की है वो अनवरत चलता रहें। अच्छे कार्यों में हमें अपने परिवार वालों को ज्यादा से ज्यादा जोड़ना चाहिए। हम मन्नूलाल त्रिवेदी जी को कक्का के संबोधन से ही बुलाते थे। यह बात बिल्कुल सत्य है कि समाज में जितने भी अध्यक्ष रहे हैं उनमें विलक्ष्ण प्रतिभा के धनी थे। रजिस्टार फर्म्स एवं सोसायटी की कॉपी से ज्ञात हुआ कि समाज के संविधान 25.10.1961 में जब लागू हुआ था उस समय हमारे सचिव मन्नूलाल त्रिवेदी जी थे। लगभग 20 वर्षों के बाद वे अध्यक्ष बने । शुक्ल जी ने समाज के उत्थान में सिर्फ अध्यक्ष सचिव का योगदान के अलावा उपाध्यक्ष एवं सहसचिव का योगदान भी महत्वपूर्ण है।
अगली क्रम में समाज के सचिव सुरेश मिश्र ने त्रिवेदी जी जीवन पर संक्षिप्त प्रकाश डाला। उन्होने बताया कि त्रिवेदी जी का जन्म 28 मई 1889 में पडरी, जिला उन्नाव उत्तरप्रदेश में पं. अम्बिका प्रसाद त्रिवेदी जी के घर पर हुआ। त्रिवेदी जी के पूरे परिवार में समाज उत्थान के कार्यों के गुण विद्यामान हैं। पूर्व सचिव अशोक त्रिवेदी जी भी समाज के सचिव रहें। इसी कड़ी में स्व. शिखा त्रिवेदी जी भी समाज की उपाध्यक्ष पद रहकर समाज उत्थान के कार्य किये। परिवार के सदस्य पं. शिरीष त्रिवेदी जी ने बताया कि शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त के पश्चात् वे सन 1982 से 1984 तक समाज के अध्यक्ष रहे। महावीर गौशाला के प्रबंधक के रूप में गौशाला के पशुधन की संख्या में वृद्धि, दुध उत्पादन में वृद्धि, गौशाला में आपने विभिन्न दानदाताओं को जोड़ा। होली फाग गीत के काफी शौकीन थे। उनकी दिनचर्या में रामचरित मानस का पाठ प्रतिदिन करते थे। स्वास्थ्य के प्रति काफी सजग थे। सभी को स्वास्थ के प्रति हमेशा जागरूक करते थे। पं. शैलेन्द्र त्रिवेदी में अपने संस्मरण में बताया कि कक्का जी दबंग व्यक्तित्व थे। 1960 में जब वे भोपाल आए थे तब वे बहुत दुबले पतले दिखते थे। प्रतिदिन दंड बैैठक, कुश्ती किया करते थे। स्वास्थ के प्रति बहुत सजग थे। परिवार से डॉ. सुशील त्रिवेदी जी के अपने उद्बोधन में बताया कि जो अपना इतिहास नहीं जानता वो अपना भविष्य नहीं बना सकता। जो अपने पुरर्खों का स्मरण करता है मेरे अनुमान से कान्यकुब्ज ब्राह्मण समाज एकमात्र ऐसा समाज है जो अपने पुरर्खों का स्मरण करता है। अपनी जीवन शैली को बचाना है तो अपने स्वास्थ के प्रति हमें सजग रहना चाहिए। वे हमकों कहते थे हाथ पैर को हिलाया करों। आज एकांकी परिवार को संभालना मुसकिल है। परंतु वे अपने 4-4 पीढ़ी को संभाला। जितनी भी शादी-विवाह होती थी। वे एक जगह बैठकर कंट्रोल किया करते थे। वे अपने दायित्व को पूरी ईमानदारी से निभाते थे। उपाध्यक्ष पं. राघवेन्द्र मिश्र ने आभार प्रदर्शन किया। कार्यक्रम का संचालन सहसचिव पं. रज्जन अग्निहोत्री ने किया।

कार्यक्रम में समाज के अध्यक्ष पं. अरुण शुक्ल, सचिव पं. सुरेश मिश्र, उपाध्यक्ष पं. राघवेन्द्र मिश्र, उपाध्यक्षा श्रीमती निशा अवस्थी, सहसचिव पं. रज्जन अग्निहोत्री, डॉ. सुशील त्रिवेदी, पं. शैलेन्द्र त्रिवेदी, पं. शिरीष त्रिवेदी, पं. गिरजा शंकर दीक्षित, पं. प्रकाश अवस्थी, श्रीमती सुधा शुक्ला, श्रीमती अर्चना त्रिवेदी, श्रीमती रीता पाण्डेय, पं. शशिकांत मिश्र, पं. आ.के. दीक्षित, पं. जे.पी.मिश्र, पं. अनिल शुक्ल, पं. प्रशांत तिवारी, पं. शारदा प्रसाद बाजपेयी, पं. अमित बाजपेयी, पं. एस.एस. त्रिवेदी, पं. एन.एल.शुक्ल, पं. मोहन दुबे आदि उपस्थित रहें।

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