पिता के संस्कार, 24 घंटे की मेहनत और सीखने का जुनून – हमर पहुना में अमर अग्रवाल ने खोला सफलता का राज

‘हमर पहुना’ में पूर्व मंत्री ने सुनाया बचपन से अब तक का राजनीतिक सफर, पिता को बताया अपना सबसे बड़ा मार्गदर्शक; संजीवनी 108, महतारी एक्सप्रेस 102 से अरपा तक कई मुद्दों पर खुलकर रखी बात

बिलासपुर। राजनीति की दुनिया में कई लोग पद से पहचाने जाते हैं, लेकिन कुछ की पहचान उनके पीछे खड़े संस्कार और मार्गदर्शकों से बनती है। छत्तीसगढ़ के पूर्व कैबिनेट मंत्री और बिलासपुर के वरिष्ठ विधायक अमर अग्रवाल के राजनीतिक सफर की कहानी में सबसे मजबूत किरदार उनके पिता स्व. लखीराम अग्रवाल का है। रविवार को बिलासपुर प्रेस क्लब के पारंपरिक कार्यक्रम ‘हमर पहुना’ में पहुंचे अमर अग्रवाल ने अपने बचपन, परिवार, राजनीति में प्रवेश, मंत्री के रूप में काम करने के अनुभव और वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर पत्रकारों से खुलकर संवाद किया। प्रेस क्लब अध्यक्ष अजित मिश्रा, उपाध्यक्ष विजय क्रांति तिवारी, सचिव संदीप करिहार और सह-सचिव हरिकिशन गंगवानी ने अतिथि का साल, श्रीफल भेंट कर स्वागत किया और स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया।

पिता की राजनीति घर में ही बनी पहली पाठशाला

अमर अग्रवाल ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत का श्रेय अपने पिता स्व. लखीराम अग्रवाल को देते हुए कहा कि उनके पिता अविभाजित मध्यप्रदेश में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और राज्यसभा सदस्य रहे। उनका राजनीतिक जीवन आदर्श और सेवा भावना से प्रेरित था। उन्होंने कभी पीए तक नहीं रखा और पिता के कामकाज में साथ देते-देते अमर अग्रवाल का राजनीति से स्वाभाविक जुड़ाव होता गया। उन्होंने बताया कि पिता की वजह से बचपन में ही भाजपा के कई दिग्गज नेताओं का घर आना-जाना देखा। सुंदरलाल पटवा, कैलाश जोशी, कुशाभाऊ ठाकरे और राजमाता सिंधिया जैसे नेताओं को करीब से देखने और सुनने का अवसर मिला। यही माहौल आगे चलकर उनके राजनीतिक संस्कारों की बुनियाद बना।

डॉक्टर बनने का सपना, राजनीति ने बदल दी राह

22 सितंबर 1963 को खरसिया में जन्मे अमर अग्रवाल की प्रारंभिक शिक्षा खरसिया में हुई। इसके बाद बिलासपुर में कक्षा 9वीं से 11वीं तक बायोलॉजी की पढ़ाई की। उनका सपना डॉक्टर बनने का था। रायपुर के साइंस कॉलेज से पढ़ाई शुरू की, बाद में दुर्ग कॉलेज पहुंचे और फिर बिलासपुर लौटकर सीएमडी कॉलेज से बीकॉम की पढ़ाई पूरी की।

1996 में युवा मोर्चा से लेकर मंत्री पद तक का सफर

पारिवारिक व्यवसाय से जुड़े रहने के दौरान जब उन्हें प्रदेश की राजनीति में जिम्मेदारी देने की बात हुई तो उन्होंने शुरुआत में इनकार कर दिया। इसके बाद वर्ष 1996 में उन्हें भारतीय जनता युवा मोर्चा का जिलाध्यक्ष बनाया गया। 1998 में बिलासपुर विधानसभा से पहली बार चुनाव मैदान में उतरे। वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ अलग राज्य बना और 2003 में वे दोबारा बिलासपुर से विधायक निर्वाचित हुए।

पहली फाइल से सीखा प्रशासन, फिर एक घंटे में 100 फाइलों का निपटारा

मंत्री के शुरुआती दिनों का किस्सा साझा करते हुए उन्होंने बताया कि उद्योग और वित्त विभाग की पहली फाइल आई तो प्रक्रिया नहीं आती थी। सचिव ने पूरी प्रक्रिया समझाई। यहीं से तय किया कि प्रशासनिक कामकाज सिर्फ अधिकारियों पर नहीं छोड़ा जा सकता। रोज पढ़ना शुरू किया और 2003 से 2018 तक अलग-अलग विभागों में काम करने के बाद एक घंटे में करीब 100 फाइलों के निपटारे की क्षमता विकसित हो गई।

‘जो नहीं आता, उसे सीखना है’ यही बना जीवन का मूल मंत्र

पहली बार ध्वजारोहण का अवसर मिला तो सलामी, परेड और प्रोटोकॉल की जानकारी नहीं थी। तत्कालीन एसपी बी.एस. मरावी और कलेक्टर विकास सील को बंगले बुलाकर पूरी प्रक्रिया समझी। बोले- सीखने में कभी संकोच नहीं हुआ।

स्वास्थ्य मंत्री रहते विदेश से सीखा मॉडल, छत्तीसगढ़ में शुरू हुई 108 और 102 सेवा

स्वास्थ्य व्यवस्था समझने WHO का कामकाज देखने विदेश गए। नार्वे में समझा कि सिर्फ डॉक्टर बढ़ाने से समाधान नहीं होगा। लौटकर संजीवनी एक्सप्रेस 108 और महतारी एक्सप्रेस 102 शुरू की। विदेश यात्राएं शनिवार-रविवार को रखते थे ताकि सोमवार से शुक्रवार काम प्रभावित न हो।

अरपा को लेकर बोले: स्वरूप बिगाड़ा गया, पानी रोकने में अब भी चुनौती

अमर अग्रवाल ने कहा कि अरपा के मूल स्वरूप से छेड़छाड़ हुई है। शिवघाट और पचरीघाट बने, पर पानी रोकना अब भी चुनौती है। इस विषय में लिखित विरोध दर्ज कराया था।

30 साल के मास्टरप्लान का असर पांच साल बाद दिखेगा

शहर के 30 साल के भविष्य को ध्यान में रखकर मास्टरप्लान मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में पारित कराया गया है, इसका परिणाम पांच वर्षों में दिखाई देगा।

‘आज जो कुछ हूं, पिता लखीराम अग्रवाल की वजह से हूं’

अपने संबोधन में पिता को सबसे बड़ा मार्गदर्शक बताया। कहा- हर व्यक्ति के पास दिन में 24 घंटे समान होते हैं, फर्क सिर्फ इस्तेमाल का है। अपना टाइम टेबल और संकल्प स्वयं तय करना चाहिए।

राजनीति के बीच खाने का भी अपना अंदाज

‘हमर पहुना’ में उन्होंने बताया कि वे पूरी तरह शाकाहारी हैं और सादा भोजन पसंद करते हैं। जापानी, थाई और इटालियन वेज भी पसंद है, पर बिलासपुर की भजिया-चटनी का स्वाद सबसे अलग है।


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