व्यवहार में नम्रता, वाणी में मिठास और चेहरे पर आत्मविश्वास की चमक परिपक्व व्यक्ति की पहचान – ब्रह्मा कुमारी मंजू दीदी

बिलासपुर, 15 सितंबर : ब्रह्मा कुमारीज़, शिव अनुराग भवन में आयोजित ‘गीता की राह वाह जिंदगी वाह’ शिविर के आठवें दिन, ब्रह्मा कुमारी मंजू दीदी ने श्रीमद् भगवद् गीता के गहन आध्यात्मिक ज्ञान पर प्रकाश डालते हुए इस बात पर जोर दिया कि परमात्मा वह परम शक्ति हैं, जिन्होंने आज से 5000 वर्ष पूर्व श्रीमद् भगवद् गीता का श्रेष्ठ ज्ञान दिया था, और आज पुनः यही समय है इस ज्ञान को अपने जीवन में प्रैक्टिकल में धारण करने का।

दीदी ने बताया कि परमात्मा ज्योति स्वरूप हैं, परमधाम के निवासी हैं, और प्यार व शक्तियों के सागर हैं। उन्होंने स्पष्ट किया, “हम परमात्मा नहीं बन सकते। परमात्मा एक ही है। हम सब आत्माएं हैं,” और परमात्मा एवर प्योर हैं, वे जन्म-मरण के चक्र में नहीं आते। मंजू दीदी ने समझाया कि परमात्मा गुप्त रूप से एक साधारण मानव तन का आधार लेते हैं, जिन्हें कोटों में कोई और कोई में भी कोई पहचान पाता है। ज्ञान रूपी तीसरे नेत्र के द्वारा भाग्यशाली आत्माओं को ही उनका दिव्य परिचय प्राप्त होता है।
शिविर में त्रिगुणों – सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण – की विस्तृत चर्चा हुई। दीदी ने समझाया कि ये गुण किस प्रकार मनुष्य आत्मा को बांधते हैं और इनसे ऊपर उठकर जीवन मुक्त स्थिति कैसे प्राप्त की जा सकती है, जिसे शास्त्रों में मोक्ष की अवस्था भी कहा गया है। उन्होंने बताया कि आत्माएं परमधाम से इस कर्म क्षेत्र पर उतरती हैं और सतोप्रधान से सतो सामान्य, रजो प्रधान और फिर तमो प्रधान स्टेज में आती हैं।

ब्रह्मा कुमारी मंजू दीदी ने दिव्य गुणों को जीवन में धारण करने के महत्व पर बल दिया। उन्होंने श्रीमद् भगवद् गीता के 16वें अध्याय का उल्लेख करते हुए निर्भयता, आध्यात्मिक ज्ञान की दृढ़ता, इंद्रियों पर नियंत्रण, अहिंसा, सत्यता, क्रोधहीनता, त्याग, शांति प्रियता, करुणा भाव, क्षमाशीलता और पवित्रता जैसे गुणों को अपनाने का आह्वान किया। साथ ही, पाखंड, अभिमान, क्रोध, निष्ठुरता और अज्ञानता जैसी आसुरी प्रवृत्तियों से बचने की सलाह दी। उन्होंने जोर दिया, “जो आपसे जलते हैं, उनसे घृणा कभी नहीं करें, क्योंकि वही यह लोग हैं जो समझते हैं कि आप उनसे बेहतर हैं”।

दीदी ने परमात्मा के साथ विभिन्न संबंधों की अनुभूति पर भी प्रकाश डाला, चाहे वे माता, पिता, दोस्त, या साजन के रूप में हों। उन्होंने कहा, “आज कोई ना कोई एक गहरा संबंध उस परम शक्ति परमात्मा से मुझे जोड़ना है,” जिससे आत्मा को सर्व प्राप्तियों की अनुभूति होती है। उन्होंने यह भी कहा कि परमात्मा माता-पिता, टीचर और गुरु के रूप में हमें शांति, प्रेम, आनंद और शक्ति की प्रॉपर्टी देते हैं, और उनके एहसानों का रिटर्न हम कभी चुका नहीं सकते।

मनुष्य आत्मा के कर्तव्यों पर प्रकाश डालते हुए दीदी ने कहा, “किसी का अच्छा नहीं कर सकते तो किसी का बुरा तो करो ही नहीं। पाप का खाता हमारा ही तैयार होता है”। उन्होंने गलत कर्मों के परिणामों को स्वयं ही भुगतने की बात दोहराई और जीवन में विवेक जागृत रखने की प्रेरणा दी। समस्याओं के समाधान के लिए सही सलाहकार का चुनाव करने को महत्वपूर्ण बताया, जैसे अर्जुन ने श्री कृष्ण को चुना था।

मंजू दीदी ने श्रीमद् भगवद् गीता के 17वें अध्याय के आधार पर भोजन की शुद्धता पर भी मार्गदर्शन दिया, जिसमें अत्यधिक पका हुआ, बासी, सड़ा हुआ या प्रदूषित भोजन न करने और सात्विक, फल-फलाहार को प्राथमिकता देने की बात कही गई।
उद्बोधन के अंत में, दीदी ने भगवत गीता के 18वें अध्याय “मोक्ष सन्यास योग” के सार को समझाते हुए कहा कि पके हुए फल की तीन पहचान – नरम हो जाना, मीठा हो जाना और रंग बदल जाना – वैसे ही व्यक्ति में नम्रता, वाणी में मिठास और चेहरे पर आत्मविश्वास की चमक आ जाती है। उन्होंने भगवान के वचन को याद दिलाया: “सर्व धर्म परित्यज्य मामेकम शरणम व्रज अहम सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः” – सभी प्रकार के धर्मों का परित्याग करो, केवल मेरी शरण में आ जाओ तो मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूंगा, अर्जुन डरो मत।

मंजू दीदी ने प्रतिभागियों को हिन्दी दिवस की शुभकामनायें देते हुए आगामी एडवांस कोर्स और ‘भाग्य विधाता’ मूवी के प्रदर्शन की भी जानकारी दी, जिसका उद्देश्य जीवन में अपने भाग्य का विधाता स्वयं बनने की प्रेरणा देना है। उन्होंने भारतीय संस्कृति और श्रीमद् भगवद् गीता पर गर्व व्यक्त करते हुए देशभक्ति के उद्गार भी व्यक्त किए, “हमें गर्व है कि हम भारत देश में पैदा हुए”।

यह शिविर प्रतिभागियों को आध्यात्मिक जागृति, स्वयं को जानने और परमात्मा से संबंध जोड़ने के एक अनूठे अनुभव से भर रहा है, जिससे वे अपने जीवन को और अधिक सुंदर और अर्थपूर्ण बना सकें।

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