
शिव अनुराग भवन में परमात्म महावाक्य, दिव्य बुद्धि’ और ‘अनुभव की अथॉरिटी’ बनने का आह्वान

बिलासपुर: राजकिशोर नगर स्थित ब्रह्माकुमारीज़ के सेवा केंद्र में आयोजित एक विशेष आध्यात्मिक सत्र में परमात्म महावाक्य – ‘दिव्य बुद्धि और अनुभव की अथॉरिटी’ विषय पर गहरा प्रकाश डाला गया। इस दौरान साधकों को आध्यात्मिक उन्नति के व्यावहारिक गुर सिखाए गए।
धर्म और कर्म का संतुलन है श्रेष्ठता का आधार
ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी ने कहा कि परमात्मा ने अपने बच्चों को ‘दिव्य व श्रेष्ठ बुद्धिमान’ का स्वमान दिया है। इस स्वमान को सिद्ध करने के लिए धर्म (धारणा) और कर्म के बीच संतुलन होना अनिवार्य है। अक्सर कर्म करते समय मनुष्य आत्माएँ शारीरिक या मानसिक थकान के कारण चिड़चिड़ेपन या नकारात्मकता का शिकार हो जाती हैं, जिसका अर्थ है कि उस समय वे अपने ‘धर्म’ या दिव्य गुणों को भूल गई हैं। जिस प्रकार एक रस्सी पर चलने वाला कलाकार बैलेंस बिगड़ने पर गिर जाता है, वैसे ही कर्म में धर्म का बैलेंस न होने से आध्यात्मिक पतन की संभावना रहती है।
चारों विषयों में बनें ‘अनुभव की अथॉरिटी’
दीदी ने परमात्म महावाक्यों को सुनाते आगे कहा कि सभी साधकों को ज्ञान, योग, धारणा और सेवा—इन चारों ही विषयों में अनुभव की अथॉरिटी बनने का लक्ष्य दिया गया है। केवल ज्ञान का वर्णन करना या उसे कॉपी में नोट करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस ‘वरदान रूपी बीज’ को समय पर कार्य में लगाकर फलीभूत करना ही वास्तविक पुरुषार्थ है। अनुभव की अथॉरिटी को माया भी विचलित नहीं कर सकती क्योंकि यह अन्य सभी सांसारिक शक्तियों से पदम गुना ऊँची है।
संतुष्टता: जीवन की महानतम शक्ति
दीदी ने ‘संतुष्टमणि’ बनने पर विशेष जोर दिया। संतुष्ट आत्मा वह है जो सर्व प्राप्तियों से संपन्न हो और जिसके चेहरे पर सदैव प्रसन्नता और हर्षितमुखता की चमक बनी रहे। ऐसी आत्मा के लिए बड़ी से बड़ी परिस्थिति भी एक ‘कार्टून शो’ के मनोरंजन की तरह होती है, जो उसे परेशान करने के बजाय मनोरंजन का अनुभव कराती है।
सतसंग के अंत में सभी ने ‘मैं दिव्य व श्रेष्ठ बुद्धिमान आत्मा हूँ’ के स्वमान में स्थित होकर विश्व शांति के लिए योग अभ्यास किया। रोज शाम के सत्र में सभी को अभ्यास के लिए चिंतन दिया जा रहा है जिसे साधक भी मनन चिंतन करके सभी के समक्ष साझा करते हैं।