
हितग्राही विष्णु देव गढ़वाल के देहावसान के बाद उठे सवाल – जब अपनों ने छोड़ा तो गैरों ने निभाया रिश्ता
शोचनीय है… आखिर कहाँ चले गए हमारे संस्कार, रिश्ते और इंसानियत?
“कितना बदल गया इंसान… न कोई रिश्ता, न कोई नाता…” आज यह पंक्ति केवल किसी गीत के बोल नहीं, बल्कि हमारे बदलते समाज की एक कड़वी सच्चाई बनकर सामने खड़ी है।
हम विकास कर रहे हैं, आधुनिक हो रहे हैं, बड़े-बड़े मकान बना रहे हैं, सुविधाएँ जुटा रहे हैं, सोशल मीडिया पर हजारों लोगों से जुड़े हैं… लेकिन क्या हमने कभी रुककर यह सोचा है कि हमारे अपने रिश्ते कहाँ चले गए? हमारी संवेदनाएँ कहाँ खो गईं? और वे संस्कार कहाँ चले गए, जिन पर कभी भारतीय समाज गर्व करता था?
आज सुवाणी शांतिधाम सुखाश्रम में घटी एक घटना ने एक बार फिर मन को भीतर तक झकझोर दिया।
हमारे आश्रम के हितग्राही श्री विष्णु देव गढ़वाल जी का आज देहावसान हो गया। जीवन के अंतिम पड़ाव में उनके साथ उनका अपना परिवार नहीं था। पत्नी और बच्ची बहुत पहले ही उनका साथ छोड़ चुके थे। उनकी सगी बहन कुछ समय तक उनके साथ रहीं, लेकिन परिस्थितियों ने ऐसा मोड़ लिया कि अंततः वे भी आश्रम में एक हितग्राही के रूप में रहने लगीं। और आज विष्णु देव जी इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह गए।
यह केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं है। यह हमारे पूरे समाज के सामने खड़ा एक गंभीर और शर्मनाक सवाल है।
आखिर कहाँ चले गए वे रिश्ते? कहाँ गया वह भाई, जो अपने भाई के लिए हर मुश्किल में दीवार बनकर खड़ा होता था? कहाँ गई वह बहन, जिसके लिए भाई की खुशियाँ सबसे बड़ी खुशी हुआ करती थीं? कहाँ गया वह परिवार, जिसके लिए बुजुर्ग घर की नींव और आशीर्वाद हुआ करते थे?
आज कई बार रिश्ते खून से नहीं, बल्कि स्वार्थ से पहचाने जाने लगे हैं। जब तक इंसान स्वस्थ है, कमाने की स्थिति में है, तब तक उसके आसपास रिश्तों की भीड़ रहती है। लेकिन जैसे ही उम्र ढलती है, शरीर कमजोर होता है और उसे सहारे की जरूरत पड़ती है, वही रिश्ते धीरे-धीरे दूर होने लगते हैं। और अंततः कोई बुजुर्ग किसी आश्रम की चौखट पर पहुँच जाता है।
लेकिन इस अंधेरे में आज भी इंसानियत की रोशनी बाकी है
तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। आज भी समाज में ऐसे संवेदनशील लोग हैं, जो बिना किसी स्वार्थ के दूसरों के दुख में खड़े होते हैं। रेखा आहूजा, सतराम जेठमलानी, राजेश खरे और श्याम तिवारी जैसे लोग उन बेसहारा और उपेक्षित लोगों के लिए किसी देवदूत से कम नहीं हैं। इनका उनसे कोई खून का रिश्ता नहीं है, फिर भी इनके दिल में उनके लिए अपनापन है।
रिश्ता केवल खून का नहीं होता…
रिश्ता संवेदना का होता है, सम्मान का होता है, विश्वास का होता है। रिश्ता उस हाथ का होता है, जो गिरते हुए इंसान को थाम ले।
आज जब रिश्ते दम तोड़ रहे हैं, तब रेखा आहूजा , सतराम जेठमलानी , राजेश खरे और श्याम तिवारी जैसे लोग हमें याद दिलाते हैं कि – “इंसान होना आसान है, लेकिन इंसानियत निभाना बहुत कठिन है।”
कल हमारी बारी भी हो सकती है
आज हमें यह सोचना होगा कि जब हमारी उम्र ढलेगी, जब हमारे कदम लड़खड़ाएँगे, तब हमारे आसपास कौन होगा? क्या हमारे बच्चे हमारे साथ होंगे? क्या हमारे भाई-बहन हमारा हाथ थामेंगे? या फिर हमें भी किसी आश्रम की चौखट तलाशनी पड़ेगी?
इसलिए आज आवश्यकता है कि हम अपने बच्चों को केवल शिक्षा न दें, बल्कि संस्कार भी दें।
सुवाणी शांतिधाम सुखाश्रम – जहाँ रिश्ते फिर से बनाए जाते हैं
सुवाणी शांतिधाम केवल रहने की जगह नहीं है। यह उन लोगों के लिए एक परिवार बनने का प्रयास है, जिन्हें जिंदगी ने कहीं न कहीं अकेला कर दिया है।
रेखा आहूजा, सतराम जेठमलानी राजेश खरे श्याम तिवारी और ऐसे सभी संवेदनशील लोगों को नमन, जो यह साबित कर रहे हैं कि इंसानियत अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
आज विष्णु देव गढ़वाल जी को भावभीनी श्रद्धांजलि। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें।