

30 अगस्त 2026 बिलासपुर। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरी विश्व विद्यालय की मुख्य शाखा राजयोग भवन, बिलासपुर द्वारा स्थानीय केंद्रीय जेल के पुरुष सेल में एक अत्यंत भावुक और आध्यात्मिक रक्षाबंधन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस विशेष अवसर पर ब्रह्माकुमारी केंद्र की बहनों ने जेल में पुरुष बंदी भाइयों को रक्षा सूत्र (राखी) बांधकर उनके उज्ज्वल और व्यसनमुक्त भविष्य की कामना की। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य सलाखों के पीछे जीवन बिता रहे भाइयों के भीतर सकारात्मक सोच का संचार करना और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ना था।वरिष्ठ राजयोग शिक्षिका संतोषी दीदी जी ने रक्षाबंधन के गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ को विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि रक्षाबंधन केवल सूत के धागों का त्योहार नहीं है, बल्कि यह आत्मा का परमात्मा से पवित्र संबंध जोड़ने का पर्व है। वर्तमान समय में मनुष्य काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसी विकारों की अग्नि में जल रहा है। सच्चा रक्षाबंधन तब सिद्ध होगा जब हम अपने भीतर के इन विकारों को त्यागने का दृढ़ संकल्प लेंगे। दीदी जी ने बंदि भाइयों को सांत्वना देते हुए कहा कि जीवन में कभी-कभी ऐसा मोड़ आता है जब एक कमजोर पल में गुस्से की एक झटके में या गलत संगति के कारण हमसे कोई भूल हो जाती है उस एक भूल की सजा यह चार दिवारी है, लेकिन याद रखिए यह आपके जीवन का अंत नहीं है, यह आपके जीवन का टर्निंग पॉइंट सुधार का केंद्र बन सकता है। वाल्मीकि जी भी कभी डाकू थी लेकिन जब उन्हें ज्ञान मिला तो वह महर्षि बन गए। इतिहास गवाह है कि परिवर्तन एकांत में हो सकता है। अतीत में हुई गलतियों के कारण आज वे यहाँ हैं, लेकिन वर्तमान को सुधारकर वे अपने भविष्य को सुंदर बना सकते हैं। परमात्मा हर आत्मा को क्षमा कर उसे पावन बनने का अवसर देते हैं। संतोषी दीदी ने जीवन में दुखों और अपराधों के पीछे मुख्य कारण ‘व्यसन’ (नशा) को बताया। उन्होंने बंदि भाइयों को प्रेरित करते हुए कहा कि नशा न केवल शरीर को नष्ट करता है, बल्कि सोचने-समझने की शक्ति और सुंदर परिवार को भी उजाड़ देता है। दीदी जी की मर्मस्पर्शी अपील का बंदि भाइयों पर गहरा प्रभाव पड़ा। कार्यक्रम के दौरान उपस्थित सैकड़ों बंदि भाइयों ने भावुक होकर जीवन में कभी भी नशा न करने और अपनी बुरी आदतों को हमेशा के लिए छोड़ने का हाथ उठाकर दृढ़ संकल्प लिया। ब्रह्माकुमारी बहनों ने जेल के पुरुष सेल में जाकर अत्यंत आत्मीयता के साथ सभी बंदियों के मस्तक पर तिलक लगाया। बहनों ने उनके हाथों में पवित्र रक्षा सूत्र बांधा। रक्षा सूत्र बंधवाते समय कई बंदियों की आँखें छलक आईं। जेल के भीतर घर और बहनों की कमी को महसूस कर रहे भाइयों के लिए यह क्षण अत्यंत भावुक कर देने वाला था। कार्यक्रम के अंत में सभी को नियमित रूप से राजयोग मेडिटेशन का अभ्यास कराया गया, ताकि वे जेल परिसर के भीतर भी मानसिक शांति और आंतरिक शक्ति का अनुभव कर सकें।
