प्लास्टिक मुक्त जीवन ही सुरक्षित भविष्य का आधार – डॉ. कमल छाबड़ा

26 अप्रैल 2026 बिलासपुर।प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय बिलासपुर की मुख्य शाखा टेलीफोन रोड स्थित राजयोग भवन में आयोजित बाल व्यक्तित्व शिविर की तीसरे दिन अत्यंत उत्साहपूर्ण और ज्ञानवर्धक रहा। आज के सत्र में बच्चों में नैतिक मूल्यों के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक किया गया।
लायंस क्लब रॉयल बिलासपुर के एडमिनिस्ट्रेटर लायन डॉ. कमल छाबड़ा जी ने ‘पर्यावरण और हमारी जिम्मेदारी’ विषय पर बात करते हुए बताया कि किस प्रकार प्लास्टिक आज हमारी पृथ्वी के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। डॉ. कमल छाबड़ा ने विस्तार से समझाया कि प्लास्टिक न केवल मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को खत्म कर रहा है, बल्कि समुद्री जीवों और मनुष्यों के स्वास्थ्य पर भी घातक प्रभाव डाल रहा है। उन्होंने बच्चों से अपील की कि वे प्लास्टिक की थैलियों का त्याग करें और इसके स्थान पर कपड़े या जूट की थैली का अधिक से अधिक प्रयोग करें। उन्होंने बच्चों को संकल्प दिलाया कि वे न केवल स्वयं प्लास्टिक मुक्त जीवन अपनाएंगे बल्कि अपने परिवार और मित्रों को भी इसके लिए प्रेरित करेंगे। उपस्थित सभी बच्चों को कपड़े के थैलियों का वितरण किया गया। बच्चों को संदेश दिया गया कि वे बाजार जाते समय हमेशा अपनी थैली साथ रखें ताकि सिंगल यूज़ प्लास्टिक से बचा जा सके।
कार्यक्रम के अगले चरण में बीके मनोरंजन पाढ़ी ने बच्चों को ‘ब्रेन स्टॉर्मिंग’ और मस्तिष्क की कार्यप्रणाली के बारे में रोचक जानकारी दी। उन्होंने बताया कि मनुष्य के मस्तिष्क के दो हिस्से होते हैं— राइट ब्रेन और लेफ्ट ब्रेन। लेफ्ट ब्रेन जहां तर्क, गणित और भाषा का केंद्र है, वहीं राइट ब्रेन रचनात्मकता, कल्पना और भावनाओं से जुड़ा है। उन्होंने विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से बच्चों को सिखाया कि कैसे वे दोनों मस्तिष्क के बीच संतुलन बनाकर अपनी सीखने की क्षमता और याददाश्त को बढ़ा सकते हैं।
ब्रह्माकुमारी आरती दीदी ने बच्चों को सात्विक आहार की महत्ता समझाई। उन्होंने बताया कि “जैसा अन्न, वैसा मन” के सिद्धांत पर चलते हुए हमें अपने भोजन का चयन करना चाहिए। आरती दीदी ने जानकारी दी कि भोजन में ताजे फल, सब्जियां, अंकुरित अनाज और घर का बना सादा भोजन शामिल करना चाहिए। उन्होंने बच्चों को सिखाया कि भोजन केवल शरीर की भूख मिटाने के लिए नहीं, बल्कि मन की शांति के लिए भी है। उन्होंने ‘कैसे खाएं’ पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भोजन हमेशा शांत मन से, चबा-चबाकर और ईश्वर की स्मृति में करना चाहिए, जिससे वह प्रसाद बन जाता है और शरीर को अधिक ऊर्जा प्रदान करता है। बीके परमानंद भाई ने कहा कि जिस प्रकार एक हीरे की पहचान उसकी चमक से होती है, उसी प्रकार एक बच्चे की असली पहचान उसके चरित्र और संस्कारों से होती है। उन्होंने बच्चों को समझाया कि ईमानदारी, अनुशासन, बड़ों का सम्मान और धैर्य ऐसे मूल्य हैं, जिन्हें अपनाकर कोई भी साधारण बच्चा ‘मूल्यवान व्यक्तित्व’ का स्वामी बन सकता है।

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