
श्रीसूर्या पुष्पा पोर्टल न्यूज ने विशिष्ट व्यक्तियों की उपलब्धियों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए सफरनामा की शुरुआत की है इसी कड़ी में आज सर्वप्रथम बहुजन सुखाय, बहुजन हिताय की राह पर चलने वाले शिक्षाविद और समाज-योद्धा डा.अशोक पांडेय पर पहले लेख का प्रकाशन किया जा है*

1. मिट्टी से निकला हौसला, शिक्षा से रौशन किया जहाँ
24 जून 1972 को बिलासपुर के आदर्श गाँव टेमरी में अंबिका प्रसाद पांडे और निर्मला पांडे के घर जन्मे अशोक पांडे का बचपन खेत-खलिहानों और कच्ची मिट्टी की खुशबू में बीता। गाँव के सरकारी स्कूल से पढ़ाई शुरू कर उन्होंने गणित में स्नातक किया और लोक सेवा आयोग की तैयारी के लिए इंदौर गए। सीमित संसाधन थे, लेकिन जुनून असीम। साक्षात्कार तक पहुँचे, लेकिन मंज़िल बदल गई – शिक्षा देना चुना।
2. एक शिक्षक से संस्थान-निर्माता तक का सफर
अशोक पांडे ने शिक्षा को नौकरी नहीं, मिशन माना। “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” को जीवन-मंत्र बनाकर उन्होंने वंचित बच्चों तक ज्ञान की रोशनी पहुँचाई।
आज उनके नाम से जुड़े हैं:
- द्रोणा कॉलेज ऑफ IT एंड एप्लाइड सोशल साइंसेज – बिलासपुर
- द्रोणा किड्स, द्रोणा महाविद्यालय, द्रोणा शिक्षा महाविद्यालय
- द्रोणा प्रशिक्षण संस्थान – कंपनी सेक्रेटरी कोर्स के लिए
- बचपन प्ले स्कूल, एकेडमिक हाइट्स पब्लिक स्कूल, द्रोणा एबेकस, द्रोणा पब्लिक स्कूल
शिक्षा के साथ उन्होंने प्रसाद शर्मा फाउंडेशन बनाकर समाजसेवा, योग और प्राकृतिक चिकित्सा को भी बढ़ावा दिया।
3. ज्ञान के तीन आयाम: शिक्षा, ज्योतिष और पत्रकारिता
शंकर के मार्गदर्शन में उन्होंने रेकी एवं ज्योतिष चिकित्सालय की स्थापना की। सनातन ज्ञान को रेकी जैसी आधुनिक पद्धति से जोड़कर उन्होंने ज्योतिष को नया आयाम दिया। हजारों विद्यार्थियों के लिए यह अब जिज्ञासा से करियर बन गया है।
मीडिया में भी उन्होंने निष्पक्षता की अलख जगाई। राष्ट्रीय मीडिया फाउंडेशन में छत्तीसगढ़ प्रांत के उपाध्यक्ष रहते हुए वे सच को समाज के सामने लाते हैं। मानवाधिकार के लिए उनकी आवाज़ हमेशा सबसे पहले उठती है – चाहे सामने कोई भी तंत्र हो।
4. सम्मान जो खुद बोलते हैं
उनके काम को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों ने सराहा:
- 2018: “छत्तीसगढ़ सर्वश्रेष्ठ कॉलेज पुरस्कार”
- 2019: “महाकौशल गौरव अवार्ड”
- 2016: नेपाल में “शिक्षाविद पुरस्कार”
- 2023: Global Excellence Forum द्वारा “Bharat Samman – Best School of India”
- नेशनल मीडिया बेस्ट अवार्ड सहित दर्जनों सम्मान
अंतिम पंक्ति:
“घना खामोश जंगल एक भ्रम है, अब आराम कहाँ है, अभी तो बहुत दूर जाना है।”
गाँव की पगडंडी से शुरू हुई ये यात्रा आज हजारों सपनों को उड़ान दे रही है। डॉ. अशोक पांडे साबित करते हैं कि अगर इरादा पक्का हो, तो मिट्टी भी आसमान छू सकती है। 🔥