
बिलासपुर: छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक अस्मिता और पंडवानी की सबसे सशक्त आवाज, पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का आज तड़के 3 बजकर 15 मिनट पर रायपुर एम्स में उपचार के दौरान निधन हो गया। वे 88 वर्ष की थीं। उनके महाप्रयाण से लोककला का एक गौरवशाली अध्याय समाप्त हो गया।
एम्स में चल रहा था इलाज:
परिजनों के मुताबिक, डॉ. तीजन बाई पिछले कुछ समय से अस्वस्थ थीं और रायपुर एम्स में उनका इलाज चल रहा था। बुधवार तड़के 3:15 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली।
छत्तीसगढ़ी में गूंजा महाभारत:
तीजन बाई ने छत्तीसगढ़ी भाषा में महाभारत की कथाओं के जीवंत और प्रभावशाली मंचन के माध्यम से पंडवानी लोकगायन को देश-दुनिया में नई पहचान दिलाई। पारंपरिक वेशभूषा में हाथ में एकतारा लेकर उनकी प्रस्तुति दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती थी। अपनी सशक्त आवाज, प्रभावशाली अभिनय और अद्भुत प्रस्तुतीकरण शैली के बल पर उन्होंने विश्व पटल पर छत्तीसगढ़ की लोककला का गौरव बढ़ाया।
पंडवानी को दिया वैश्विक मंच:
जिला दुर्ग के गनियारी गांव की पारधी जनजाति से निकलकर डॉ. तीजन बाई ने 13 वर्ष की आयु में पंडवानी गायन शुरू किया। उनकी प्रस्तुति में भीम का रौद्र रूप, द्रौपदी की वेदना और दुर्योधन का अहंकार सजीव हो उठता था। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक सभी उनकी कला के प्रशंसक रहे।
सम्मानों से अलंकृत जीवन:
1987 में पद्मश्री, 2003 में पद्मभूषण और 2019 में पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. तीजन बाई को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, अहिल्याबाई होल्कर सम्मान सहित कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए।
मुख्यमंत्री ने व्यक्त की शोक संवेदना:
मुख्यमंत्री ने कहा, “तीजन दीदी का जाना केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं, संपूर्ण देश के लिए अपूरणीय क्षति है। उन्होंने अपनी कला से छत्तीसगढ़ी संस्कृति को वैश्विक पहचान दी। उनकी स्मृति युगों तक अमर रहेगी।”
आज होगा राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार:
डॉ. तीजन बाई का पार्थिव शरीर अंतिम दर्शन हेतु जिला दुर्ग स्थित पैतृक ग्राम गनियारी ले जाया जाएगा। आज राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार संपन्न होगा।
एक युग का अवसान:
पंडवानी और डॉ. तीजन बाई एक दूसरे के पर्याय थीं। नियति का संयोग देखिए कि ‘माता तीजन बाई सम्मान’ के दूसरे संस्करण का पोस्टर मंगलवार को ही बिलासपुर में विमोचित हुआ, और अगले ही दिन तड़के वे अनंत यात्रा पर निकल गईं।