
बिलासपुर/ भारतेंदु साहित्य समिति के तत्वावधान में कंठस्थ कविता पाठ की तृतीय मासिक गोष्ठी का आयोजन साईं आनंदम के सभा भवन में किया गया। गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार एवं उपन्यासकार केशव प्रसाद शुक्ला ने की।
अध्यक्ष श्री शुक्ला ने कंठस्थ काव्य गोष्ठी पर अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा–“मैं अपने वर्षों पुराना स्वप्न साकार होते देख रहा हूं।”
कार्यक्रम की जानकारी देते हुए विजय तिवारी जी ने बताया कि कवियों में आत्म विश्वास का विकास करने तथा उन्हें मंचीय प्रस्तुति के लिए तैयार करने के उद्देश्य से कंठस्थ काव्य- पाठ अभियान प्रारंभ किया गया है।ओम प्रकाश भट्ट जी ने कहा कि “जो साहित्यकार पुस्तकें प्रकाशित कर रहे हैं ,उसमें सैकड़ों व्याकरण संगत और वर्तनी संबंधी त्रुटियां पाई जा रही हैं। प्रकाशन के पहले इन त्रुटियों को दूर कर लेना जरूरी है अन्यथा आने वाली पीढ़ी उसे पढ़कर भ्रमित होगी।”
कार्यक्रम का सफल संचालन सजलकार मयंक मणि दुबे ने किया।गोष्ठी की विशेषता यह रही कि कवियों एवं कवयित्रियों ने बिना डायरी अथवा लिखित सामग्री देखे पूरे आत्म विश्वास के साथ अपनी रचनाओं का पाठ किया। इस अभिनव प्रयोग का श्रोताओं पर विशेष प्रभाव पड़ा और काव्य-पाठ के दौरान कवियों को खूब तालियाँ मिलीं।
कार्यक्रम में माता वंदना, वियोग-श्रृंगार, हास्य-व्यंग्य सहित विभिन्न भाव एवं रसों की रचनाएँ प्रस्तुत की गईं। कवियों एवं कवयित्रियों ने अपनी प्रस्तुतियों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया।
विजय तिवारी जी ने अपनी ओज पूर्ण रचना से श्रोताओं के हृदय में राष्ट्र प्रेम जागृत किया —
चलो बढ़ाएँ हम कदम
राष्ट्र को बदल दें हम
त्रास मुक्त हो धरा
आंख कोई हो न नम
ओमप्रकाश भट्ट जी ने अपनी व्यंग्यपूर्ण रचना से अश्लील फैशन पर करारा प्रहार किया—
सीख रहीं नित नये ढंग
कर रहीं प्रदर्शित अंग अंग
सीता मीरा लक्ष्मी दुर्गा की
इनको कुछ याद दिलाओ।
अमृतलाल पाठक ने अपनी कविता के माध्यम से कहा सज्जन व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी अपना मूल्य बनाए रखते हैं–
है जमीं में दफ्न फिर भी कीमती
अन-तराशा हूंँ मैं हीरा आज भी
पूर्व प्राचार्य ओमप्रकाश बिरथरे ने काव्य धारा को आध्यात्मिक ऊंँचाई प्रदान की—
सतगुरु के बिन जीवन सूना किस विधि जीना होय।
बसत कहाँ हैं मेरे सतगुरु पता बता दो कोय।
मयंक मणि दुबे ने उन प्रेमियों को अभिव्यक्त किया जो प्रेम को हृदय में दबा कर रखते हैं परंतु बोल नहीं सकते–
दबी राख भीतर रहा
प्रिये प्रेम की आग
अधरों पर आया नहीं
अंतस का अनुराग
गीतकार मनीषा भट्ट ने समाज में फैलती हुई वादा- खिलाफी व बेईमानी को उजागर किया–
लोग मौसम के जैसे बदलने लगे
वादा करके सदा वे मुकरने लगे
अधिवक्ता राजेश दुबे ने कॉकरोचों की उच्छ्रंखलता को आड़े हाथों लिया —
“झाड़ू” भी नहीं मरेगा कीड़ों को अब यहाँ
झाड़ू के बाप आपने
इनको दिया जनम
वरिष्ठ कवि बुधराम यादव ने कविता के माध्यम से कहा की अच्छे गीतों में धूप जैसी महक और दीप जैसा प्रकाश होता है—
धूप दीप की गंध महक से
गीत प्रार्थना गाए
गुणधर्मी शब्दों से श्रद्धा
निष्ठा हृदय जगाए
काव्य-पाठ करने वालों में सर्वश्री हूपसिंह क्षत्रिय राकेश खरे एवं सतीश पांडेय शैलेंद्र गुप्ता श्रीमती ललिता यादव श्रीमती रश्मि अग्रवाल, अनमोल सिन्हा राजेश सोनार, सत्येंद्र तिवारी श्रीमती सरोज ठाकुर दिनेश्ववर जाधव, अशोक शर्मा नरेंद्र शुक्ल 'अविचल' राजेंद्र मौर्य, दिनेश तिवारी श्रराम निहोर राजपूत श्री पदुम दास वैष्णव जगतारण डहरे श्री अजय सिन्हा रचनाकारों शामिल रहे। श्री राजकुमार शर्मा विशेष रूप से उपस्थित रहे। श्री राकेश कुमार पांडेय ने आभार व्यक्त किया
आगामी कंठस्थ काव्य गोष्ठी नवंबर माह के तीसरे रविवार को आयोजित की जाएगी।