सावन की कांवड़: आस्था का महापर्व, लाखों को रोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई उड़ान – हीरानंद जयसिंह

“वोकल फॉर लोकल” का जीवंत उदाहरण है कांवड़ निर्माण उद्योग

बिलासपुर : देश के सबसे बड़े व्यापारिक संगठन कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जितेंद्र गांधी, राष्ट्रीय सचिव राजू सलूजा, विक्रम, बिलासपुर जिला अध्यक्ष हीरानंद जयसिंह, कोषाध्यक्ष आशीष अग्रवाल, कार्यकारी अध्यक्ष दिलीप खेंडेलवाल, संजय मित्तल, सुरेंद्र अजमानी, प्रमोद वर्मा, प्रवीण सलूजा, हरदीप होरा, नितिन सलूजा, राजेश सैनी, चंदन कुमार कनोडिया, दीपक गोयल, संगठन महामंत्री परमजीत उबेजा, विष्णु गुप्ता ने संयुक्त रूप से बताया कि सावन का पावन महीना केवल भगवान शिव की भक्ति और आध्यात्मिक आस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह देश की ग्रामीण, कुटीर और पारंपरिक अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा प्रदान करने वाला एक विशाल आर्थिक अभियान भी है।

CAIT ने कहा कि कांवड़ यात्रा से जुड़ा कांवड़ निर्माण उद्योग आज लाखों लोगों की आजीविका का महत्वपूर्ण आधार बन चुका है और यह भारत की सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ आर्थिक सशक्तिकरण का भी सशक्त माध्यम है।

बिलासपुर जिला अध्यक्ष हीरानंद जयसिंह ने कहा कि उत्तराखंड सरकार के अनुसार हाल के वर्षों में हरिद्वार कांवड़ यात्रा में लगभग 4.5 करोड़ श्रद्धालुओं की भागीदारी दर्ज की गई है, जबकि झारखंड सरकार के अनुसार देवघर के विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेले में प्रतिवर्ष 50 से 55 लाख श्रद्धालु पहुंचते हैं। इन विशाल धार्मिक आयोजनों के कारण सावन के दौरान देशभर में कांवड़ों की मांग कई गुना बढ़ जाती है, जिससे एक व्यापक उत्पादन एवं व्यापारिक श्रृंखला सक्रिय हो जाती है।

उन्होंने बताया कि कांवड़ निर्माण मुख्य रूप से एक पारंपरिक कुटीर उद्योग है, जो उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार और झारखंड के अनेक ग्रामीण एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों में संचालित होता है। बिजनौर के नजीबाबाद, हरिद्वार के ज्वालापुर, मेरठ, बागपत, सहारनपुर तथा आसपास के क्षेत्रों में हजारों कारीगर परिवार पीढ़ियों से इस कला से जुड़े हुए हैं। केवल नजीबाबाद के प्रमुख कांवड़ निर्माण क्लस्टर में ही 500 से अधिक कारीगर प्रतिवर्ष लगभग 2 से 2.5 लाख कांवड़ों का निर्माण करते हैं। वहीं झारखंड में देवघर, जसीडीह, मधुपुर, दुमका और संताल परगना क्षेत्र कांवड़ निर्माण एवं उससे जुड़े हस्तशिल्प उद्योग के प्रमुख केंद्र हैं।

हीरानंद जयसिंह ने कहा कि एक कांवड़ केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि अनेक उद्योगों और व्यवसायों को जोड़ने वाली आर्थिक श्रृंखला का केंद्र है। इसके निर्माण में बांस, लकड़ी, रंगीन कागज, कपड़ा, टोकरी, झंडे, धार्मिक प्रतीक, मोती, एलईडी लाइटें, सजावटी सामग्री तथा अन्य हस्तशिल्प उत्पादों का उपयोग होता है।

उन्होंने बताया कि साधारण कांवड़ की कीमत लगभग ₹100 से ₹500 तक होती है, जबकि विशेष रूप से सजाई गई आकर्षक एवं आधुनिक कांवड़ों की कीमत ₹5,000 या उससे अधिक तक पहुंच जाती है। एक अनुमान के अनुसार कांवड़ और उससे संबंधित वस्तुओं का सालाना सीजनल व्यापार लगभग 5 हजार करोड़ रुपए का होता है।

हीरानंद जयसिंह ने कहा कि कांवड़ यात्रा से जुड़े निर्माण, परिवहन, सजावट, बिक्री, धार्मिक सामग्री, भोजनालय, आवास, अस्थायी बाजार, वस्त्र, फल, पेय पदार्थ तथा अन्य सहायक गतिविधियों को मिलाकर यह पूरा आर्थिक तंत्र प्रतिवर्ष एक से दो लाख से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष मौसमी रोजगार उपलब्ध कराता है।

उन्होंने कहा कि कांवड़ निर्माण उद्योग भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पारंपरिक कौशल, स्थानीय उद्यमिता और स्वदेशी उत्पादन क्षमता का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह उद्योग प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के “वोकल फॉर लोकल”, “लोकल टू ग्लोबल”, “आत्मनिर्भर भारत” और “मेक इन इंडिया” के संकल्प को जमीनी स्तर पर साकार कर रहा है।

बिलासपुर अध्यक्ष हीरानंद जयसिंह, कोषाध्यक्ष आशीष अग्रवाल, संगठन महामंत्री परमजीत उबेजा और बिलासपुर कैट टीम ने सरकारों से आग्रह किया कि कांवड़ निर्माण से जुड़े कारीगरों को आधुनिक डिजाइन, वित्तीय सहायता, विपणन सुविधाएं, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, तकनीकी प्रशिक्षण और कौशल उन्नयन से जोड़ा जाए ताकि यह पारंपरिक उद्योग और अधिक संगठित होकर ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सके।

उन्होंने कहा कि सावन का यह पावन पर्व हमें यह संदेश देता है कि भारत की सांस्कृतिक परंपराएं केवल आस्था का विषय नहीं हैं, बल्कि वे रोजगार सृजन, स्थानीय व्यापार संवर्धन और आर्थिक समृद्धि की सशक्त धुरी भी हैं। कांवड़ यात्रा इस बात का जीवंत उदाहरण है कि जब आस्था और अर्थव्यवस्था एक साथ आगे बढ़ती हैं, तब समाज और राष्ट्र दोनों समृद्ध होते हैं।

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