दशहरा केवल उत्सव नहीं, स्वयं को बदलने का महापर्व है – बीके स्वाति दीदी

20 अक्टूबर 2026, बिलासपुर। दशहरा केवल रावण के पुतले का दहन करने का पर्व नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर छिपे काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या और द्वेष जैसे विकारों को समाप्त करने का आध्यात्मिक संदेश देता है। जब तक मनुष्य अपने मन के विकारों पर विजय प्राप्त नहीं करता, तब तक सच्चे अर्थों में विजयादशमी नहीं मना सकता। वास्तविक दशहरा वही है, जब हम अपने अवगुणों को त्यागकर श्रेष्ठ गुणों को अपने जीवन में धारण करें। दशहरा केवल उत्सव नहीं, स्वयं को बदलने का महापर्व है। यह विचार प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय, बिलासपुर की मुख्य शाखा टेलीफोन एक्सचेंज रोड स्थित राजयोग भवन की संचालिका बीके स्वाति दीदी ने दशहरा पर्व के आध्यात्मिक रहस्य पर व्यक्त किए।
बीके स्वाति दीदी ने कहा कि भारतीय संस्कृति में प्रत्येक त्योहार अपने भीतर गहरा आध्यात्मिक संदेश समेटे हुए है। दशहरा अर्थात विजयादशमी असत्य पर सत्य, बुराई पर अच्छाई और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है। भगवान श्रीराम द्वारा रावण पर विजय प्राप्त करने की कथा हमें यह प्रेरणा देती है कि जीवन में परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि हमारे संकल्प सत्य, मर्यादा और धर्म के मार्ग पर हैं, तो अंततः विजय हमारी ही होगी।
दीदी ने बताया कि आध्यात्मिक दृष्टिकोण से रावण के दस सिर मनुष्य के भीतर मौजूद अनेक बुराइयों और कमजोरियों का प्रतीक हैं। क्रोध में विवेक खो देना, लोभ के कारण संतोष समाप्त हो जाना, अहंकार में दूसरों का अपमान करना, ईर्ष्या के कारण दूसरों की सफलता से दुखी होना और मोह के कारण सही-गलत का निर्णय न कर पाना, ये सभी ऐसी कमजोरियां हैं जो मनुष्य की आंतरिक शक्ति को कम करती हैं।
जिस प्रकार रावण का पुतला जलाया जाता है, उसी प्रकार हमें अपने भीतर की इन बुराइयों को पहचानकर उन्हें समाप्त करने का संकल्प लेना चाहिए। केवल बाहरी बुराई का प्रतीकात्मक दहन पर्याप्त नहीं है, बल्कि अपने विचारों, व्यवहार और संस्कारों में सकारात्मक परिवर्तन लाना ही इस पर्व की वास्तविक सार्थकता है।
बीके स्वाति दीदी ने कहा कि आज के समय में मनुष्य बाहरी चुनौतियों से संघर्ष करते हुए कई बार अपने मन की शांति खो देता है। छोटी-छोटी बातों पर क्रोधित होना, दूसरों से अपेक्षाएं रखना, तुलना करना और हर परिस्थिति को अपने अनुसार चलाने की इच्छा रखना तनाव तथा संबंधों में दूरी का कारण बनता है।
दीदी ने कहा कि दशहरा हमें अपने जीवन की दिशा पर चिंतन करने का अवसर देता है। हमें विचार करना चाहिए कि हमारे कौन-से संस्कार परिवार में अशांति पैदा करते हैं, कौन-सी आदतें हमारे स्वास्थ्य और संबंधों को प्रभावित करती हैं तथा कौन-से विचार हमारी प्रगति में बाधा बनते हैं। इन कमजोरियों को स्वीकार करना ही परिवर्तन की पहली सीढ़ी है।
उन्होंने सभी से आह्वान किया कि इस विजयादशमी पर कम से कम एक अवगुण को छोड़ने और एक श्रेष्ठ गुण को अपनाने का संकल्प लें। परिवार में प्रेम और सम्मान बढ़ाएं, समाज में सहयोग की भावना रखें तथा अपने शब्दों और व्यवहार से किसी को दुख न पहुंचाएं।
बीके स्वाति दीदी ने कहा कि इस दशहरे पर केवल रावण के पुतले का दहन न करें, बल्कि अपने भीतर की बुराइयों को समाप्त कर सत्य, सदाचार और आध्यात्मिक शक्ति से परिपूर्ण जीवन जीने का संकल्प लें। यही दशहरा पर्व का सच्चा आध्यात्मिक संदेश और विजयादशमी की वास्तविक विजय है।

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